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मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

by महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी

Source: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished804 pages

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Page 219

२७ ] प्रथमाध्याये द्वितीयपादः १६७
मुख्य अर्थ सम्भव रहने पर लक्षणा मानना उचित नहीं है। यदि यह कहा जाय कि इन
वाक्यों में हेतुविधि मानने का क्या फल है ? इसके समाधान में यही कहना उचित है कि
दर्वी स्थाली आदि द्रव्यों से अन्न का सम्पादन होता है, उनमें किसी एक के करने से ही
कार्य चलेगा, शूर्प से ही होम करना चाहिए—यह कोई नियम नहीं है। शूर्प ही अन्न
का करण है—यह भी बात नहीं है, वरन् दर्वी स्थाली आदि भी अन्न का करण है।
शूर्प से तो केवल तण्डुल के छिलके को हटाया जाता है, किन्तु, दर्वी, स्थाली आदि
से अन्न का पाक होता है। इसलिए शूर्प की अपेक्षा दर्वी स्थाली आदि ही अन्न का
साधकतम होने से प्रकृत में करण है। अतः शूर्प, दर्वी, स्थाली, आदि में विकल्प ग्रहण
ही उचित है—यही पूर्वपक्ष का आशय है।
'हेतुः'='हेतु विधि, 'वा' पूर्व पक्ष का सूचक, 'स्यात्' =होगा, अर्थवत्त्वोपपत्तिभ्याम् =
अर्थवत्त्व अर्थात् प्रयोजन साधकत्व एवं उपपत्ति अर्थात् युक्ति होने से, 'तेन अन्नं क्रियते"
यह वाक्य हेतु विधि है, हेतु से ही दर्वी आदि का होमसाधनत्व रूप सार्थक होता है,
इसीलिए उक्त वाक्य में 'हि' शब्द के द्वारा उपपत्ति अर्थात् युक्ति भी उल्लिखित है।
(पूर्व पक्ष) ॥ २६ ॥
स्तुतिस्तु शब्दपूर्वत्वादचोदना च तस्य ॥ १.२.२७ ॥
शा० भा०—न त्वेतदस्ति शब्दपूर्वकोऽयमर्थोऽन्नकरणं हेतुरिति । शब्द-
श्चान्नकरणं शूर्पहोमे हेतुरित्याह, न च दर्विपिठरहोमे । तेन शब्दपूर्वं शूर्पम्,
न च दर्विपिठरादेश्चोदना ॥ २७ ॥
भा० वि०—ननु गृहीतव्याप्तिकस्य लोके हेतुत्वेन व्यपदेशादन्नकरणत्वस्य च
होमसम्बन्धेन सहागृहीतव्याप्तिकत्वात् कथं हेतुत्वमिति—स्यादिति । सूत्रावयवं
निरस्याशङ्कामाह—नन्विति । अत्र क्रियासामान्यवाचिना करोतिना ज्ञानाख्यः
क्रियाविशेषो लक्ष्यते, तेन कार्यं गम्यम्, कारणं च गमकम्, गम्यगमकशब्दयोश्च
कृदन्तत्वात् तत्परेण भावप्रत्ययेन सम्बन्धाभिधायिना भवितव्यम्, कृत्तद्धित-
समासेषु सम्बन्धाभिधानं त्वतल्भ्यामिति स्मरणात् । सम्बन्धस्य च कारकाणां
क्रियोत्पादनशक्तिरूपत्वात् तस्याश्च व्याप्यव्यापकव्यवहारहेतुत्वेन व्याप्तिरूप-
त्वात् कार्यकारणभावशब्देन व्याप्तिर्गीयते, तेन व्याप्तिरूपे तस्मिन् असिद्धे कथं
हेतुव्यपदेश इत्यर्थः, लोके हेतुव्यवहारात् पूर्वमेव प्रमाणान्तरेण व्याप्तिसिद्धेः
अपेक्षात् एव, वेदे तु 'सिद्धवद्धेत्वपदेशान्यथानुपपत्तिकल्पितेन यद्यदन्नकरणं तेन
तेन होतव्यमिति वचनेन कार्यकारणभावाख्यः संबन्धो विधायिष्यते—प्रतिपाद-
यिष्यत इति सूत्रावयवेन परिहरति--सत्यमित्यादिना । हेतुः स्यादित्यनेनोक्त-
मुपसंहरति--शूर्पेणेति । अत्र च समस्तस्य वाक्यस्य केवलहेतुपरत्वात् तदन्यथा-