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मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

by महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी

Source: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished804 pages

Page 18 of 804

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[ १० ]
मन्त्र का भेद
वेद के मन्त्र तीन प्रकार के हैं।
ऋक् मन्त्र, यजुर्मन्त्र और साममन्त्र। इसका उल्लेख ऋग्वेद में ही सुलभ है--
'तमर्केभिस्तं सामभिस्तं गायत्रैश्चषणयः। इन्द्रं वर्धन्ति क्षितयः१।' प्रकृत में 'अर्क' शब्द
से यजुर्मन्त्र, 'साम' पद के द्वारा साममन्त्र और 'गायत्र' पद के द्वारा गायत्री आदि
छन्दोयुक्त शस्त्ररूप अप्रगृहीत ऋक् मन्त्र का निर्देश किया गया है। इस वैदिक आधार
पर आचार्य जैमिनि ने तीन सूत्रों से तीन मन्त्रों को कहा है---तेषामृग् यथार्थवशेन-
पादव्यवस्था (जै० सू० २।१।३४) गीतिषु सामाख्या (जै० सू० २।१।३६) शेषे यजुः-
शब्दः (जै० सू० २।१।३७) आशय यह है कि नियत अक्षर युक्त पाद एवं नियतसंख्यक
पादयुक्त और किसी विशिष्ट अर्थ के प्रकाशक मन्त्र ऋक् मन्त्र कहे जाते हैं जैसे-
'अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम् । होतारं रत्नधातमम्' (ऋ. १।१।१) इस
मन्त्र में आठ अक्षर का पाद, तीन पाद और गायत्री छन्द है। गायत्री छन्द होने से प्रत्येक
पाद में आठ अक्षर है एवं एक विशिष्ट अर्थ का प्रकाशक भी है। किन्तु याज्ञिकों ने इस
परम्परा को अक्षुण्ण रखी है कि किसी अन्य मन्त्र के पाद से इसे चार पाद का मन्त्र
नहीं माना है।
जो ऋङ् मन्त्र षड्ज, ऋषभ आदि स्वरों से युक्त होकर गेय रहते हैं-वे ही
साममन्त्र कहे जाते हैं। इसीलिए छान्दोग्य उपनिषद में कहा गया है 'तस्म.दृच्यध्यूढं
साम गीयते। (छा० २।६।५) गीतियुक्त ऋक् ही साम हैं, अतः साम मन्त्र की योनि
ऋक् कही जाती है।
ऋक् और साम से भिन्न मन्त्र ही यजुर्मन्त्र हैं। अर्थात् वे नियताक्षर पादबन्धशून्य
स्वर-संयोग-सम्पन्न गीत-रहित होते हैं। अतः इस लक्षण के अनुसार पूर्वोक्त नियताक्षर,
पादबद्ध, छन्दोबद्ध और एकार्थ-प्रतिपादक मन्त्र यजुः आरण्यक, ब्राह्मण आदि कहीं भी
निर्दिष्ट हो, वे ऋक् मन्त्र ही कहे जायेगे। अतः, शाकल संहिता में निर्दिष्ट न होने से
ही वे ऋक् मन्त्र से बहिर्भूत नहीं हैं। क्योंकि वेद एक है। मन्त्र तीन प्रकार के हैं।
स्वरसंयोग से गीत होने से साममन्त्र कहे जाते हैं। पिङ्गल आदि छन्दः शास्त्र के
अनुसार यजुः मन्त्रों में भी छन्द का निर्देश किया गया है, किन्तु, ऋग्वेद आदि के
समान नियताक्षर पादबद्धता उनमें नहीं है, यजुर्मन्त्र के पाठ में छन्दः की प्रतीति भी
नहीं होती है। इस कथन का एक मात्र आधार शेषे ब्राह्मणशब्दः (२।१।३३) यह
जैमिनि सूत्र है। छन्दः वेद के लिए व्यापक नहीं है। क्योंकि शाबरभाष्य में ही कहा
है, 'मन्त्राश्च ब्राह्मणाश्च वेदः' अर्थात् मन्त्र और ब्राह्मण दोनों में ही वेद शब्द का प्रयोग
१. ऋक्सं० ६।१।२२