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मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

by महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी

Source: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished804 pages

Page 135 of 804

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Page 135

७ ] प्रथमाध्याये द्वितीयपादः ८३
वाक्यसंबन्धपदगतयोरेकवचनयोर्विवक्षितसङ्घत्वं दर्शितं । तच्चात्र विध्युद्देशरूपमभिप्रेत-
मिति, विध्युद्देश एवेत्यनेन दर्शितम् । सम्बन्धशब्देन चात्र कर्म्मव्युत्पत्त्या विशेषणविशेष्य-
रूपौ सम्बन्धिनावभिप्रेतौ एष हि गुणो भवतीत्यर्थवादप्राशस्त्यप्रदर्शनम् । यतस्ततो भूति-
रितिवदिति कस्यचिच्छङ्का स्यात्तद्वयुदासार्थं—विध्युद्देशोत्यापितानामेकेत्याद्युक्तम् ।
नायमभिसंबन्धो विवक्षित इत्यादिना यत्प्रबन्धेन विध्युद्देशस्य प्राशस्त्याक्षेपकत्वं निराकृतम्,
तस्य प्रकृतैकवाक्यतासिद्धिप्रयोजनतां दर्शयन्स्वाभिप्रेतं सूत्रार्थमुपसंहरति—तस्मादिति ।
अनेनैवं सूत्रं व्याख्यातं विधेयभावनांशाप्रतिपादकत्वेऽपि तदनुष्ठापकानां विधीनामङ्ग-
मर्थवादा स्युः । केनोपकारेणेत्याक्षिप्ते; स्तुत्यर्थेनेत्युक्तम् । विधिनानुष्ठानसिद्ध्यर्थं स्तुते-
रुपकारकत्वेऽभिहिते विधिमात्रेणानुष्ठानसिद्धेः किं स्तुत्येत्याशङ्कानिराकरणार्थमर्थवादानां
धर्म्मप्रमोपयोगित्वसिद्धावतिक्लिष्टलाक्षणिकस्तुत्यर्थत्वाङ्गीकारकारणं विधिनैकवाक्यत्वादि-
त्यनेनोक्तमिति ॥ ७ ॥
भा० प्र०-विधिनाः स्तुति साकाङ्क्ष विधि के साथ 'तु' शब्द पूर्वपक्ष का व्यावर्तक है
'एकवाक्यत्वात्' प्रयोजन साकाङ्क्ष अर्थवादों की एकवाक्यता होने से “विधीनां” विधि-
विहित कर्म कलापों की प्रशंसा रूप प्रयोजन हेतु या प्रशंसा रूप प्रयोजन साकाङ्क्ष
लाक्षणिक अर्थ के द्वारा “स्युः” अर्थवाद सार्थक या सफल होते हैं । विधिवाक्य प्रशंसा
सापेक्ष हैं एवं अर्थवाद प्रयोजनसापेक्ष हैं, अतः अर्थवाद विधिवाक्य के साथ एकवाक्य
अर्थात् मिलित होकर विधिविहित कर्मों की प्रशंसा रूप प्रयोजन के द्वारा प्रयोजनवान्
अर्थात् सार्थक या सफल होने से प्रमाण हैं ।
आशय यह है कि—पूर्वपक्षी ने अर्थवादवाक्यों का अप्रामाण्य सिद्ध करने का प्रयास
किया था, अतः सिद्धान्ती ने इसके उत्तर में कहा है कि अर्थवाद अप्रमाण नहीं है ।
कारण, स्वाध्यायविधि से ही अवगत है कि वेद के विधि, मन्त्र, नामधेय एवं अर्थवाद
ये सभी अंश प्रमाण हैं, वेद का एक अक्षर भी निष्प्रयोजन नहीं है । विधि के प्रामाण्य
का विश्लेषण पूर्व में ही किया है । अर्थवाद का प्रामाण्य प्रस्तुत प्रसङ्ग के द्वारा सिद्ध
किया जा रहा है । क्योंकि, पूर्वपक्षी ने अर्थवाद वाक्यों का आनर्थक्य प्रदर्शित कर इनके
अप्रामाण्य की सिद्धि करने की चेष्टा की है । प्रत्यक्ष या अनुमान से सिद्ध लौकिक फल
के विषयों में ही पुरुष का स्वतः सिद्ध अनुराग के कारण स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है;
और उस फल के साधन अर्थात् जिस उपाय से फल की प्राप्ति हो सकती है; उसमें जीव
प्रवृत्त होता है । किन्तु, स्वर्गादि अलौकिक फल प्रत्यक्षगम्य या अनुमान सिद्ध न होने
से उसके उपायभूत यागादि क्रियाओं में भी स्वाभाविक प्रवृत्ति नहीं हो सकती है । अतः,
“भूतिकामो यजेत', 'अभ्युदय चाहने वाला व्यक्ति याग करे' इस विधिवाक्य को सुनकर
अभ्युदयरूप फल के साधन या उसके उपायभूत याग में पुरुष की प्रवृत्ति उत्पन्न होने
पर भी वह बलवती प्रवृत्ति नहीं होती है । इसमें कष्ट ही होगा वह अनिष्ट है; अर्थात्