मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
by भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव
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Read in context३०८ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
उपर्युक्त पद राजस्थान के जन-प्रिय भजनो की लय पर है।
भावाभिव्यक्ति मे अर्थ-सगति नही है।
३
चालो अगम के देस, काल देखत डरै।
वहाँ भरा प्रेम का हौज, हसा केल्योँ¹ करै।
ओढण लज्जा चीर, धीरज को घाघरो।
छिमता कॉकण हाथ, सुमति को मून्दरो।
दिल दुलडी दरियाव, साँच को दोवडो।
उबटन गुरु को ज्ञान, ध्यान को धोवणो।
कान अखोटा ज्ञान, जुगत को झूठणो।
बेसर हरि को नाम, चूड़ो चित उजलो।
जोहर सील सतोष, निरत को घूघरो।
विदली गज अरू हार, तिलक गुरु ग्यान को।
साज सोलह सिणगार, पहिर सोने राखड़ी।
साँवलियाँ सूं प्रीति, औराँ सूं आखडी।
पतिबरता की सेज प्रभु जी पधारिया।
गावै मीराँ बाई दासी कर राखिया ।।५५८।।†
इस तरह के गीत राजस्थान मे कीर्तन मडलियो मे विशेष रूप से
प्रचलित हैं। पदाभिव्यक्ति मे सगति का अभाव है। उपर्युक्त
दोनो पदो की भाषा आधुनिक राजस्थानी कही जा सकती है।
४
राम नाम मेरे मन बसियो, राम रसियो रिझाऊँ, ए माय।
मंद भागिण करम अभागिन, कीरत कैसे गाऊँ, ए माय।
बिरह पिजर की बाड सखी री, उठ कर जी हुलसाऊँ, ए माय।
मन कूँ मारि सजूँ सतगरु सूं, दुरमत दूर गमाऊँ, ए माय।
१ केलि, २ प्रसन्न करूँ।