मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
by भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव
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७
साधू म्हांरे आइया हेली, वे गिरधर जी रा प्यारा।
चरण धोय चरणामृत लेस्या, (हे) कलमल मेटन हार।
प्राण तो अति प्रिय लागै, (हे) कबहुन करस्या न्यारा।
प्रभु कृपा कीनी अति (मो) पर, सुधार्या जनम हमारा ॥३३५॥†
यह पद मीराँ का है, ऐसा कही से भी स्पष्ट नही होता। चतुर्वेदी
जी “प्रभु कृपा किनी अति”-के बदले “मीराँ के प्रभु गिरधर नागर”
का व्यवहार करना उत्तम समझते है जिसका कोई कारण नही देते।
ऐसा होने से प्रामाणिक पदो को छाँट लेना और भी कठिन हो जाता
है। ऐसे पदो को मीराँ के नाम पर चलाने का प्रयास निरर्थक ही प्रतीत
होता है।
८
बड़े घर ताली लागी, रे, म्हारा मन री डणारथ भागी रे।
छीलटिये म्हारो चित नही रे, डांबरिये कुण जाव।
गगा जमना सूं काम नही रे, मै तो जाय मिलूँ परियाव।
हाल्या मोल्या सूं काम नही रे, मै तो जाय करु दरबार।
काच कथीर सूं काम नही रे, म्हांरे हीरा रो व्योपार।
भाग हमारो जागियो रे, भयो समंद सूं सीर।
अमृत प्याला छाडि कै, कुण पिवै कडवी नीर।
पीपा को प्रभु परचो दीनो, दिया रे खजीना पूर।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, घणी मिल्या छै हजूर ॥३३६॥
पदाभिव्यक्ति मे सगति का अभाव है।
९
आंवो सखी रली करां दे, पर घर गवण निवारि।
झूठो माणिक मोतिया री , झूठी जगमग जोति।