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मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary

by भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव

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DevanagariRajasthanipublished365 pages

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Page 248

१६२ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
पद की भाषा प्रमुखत ब्रजभाषा है। परन्तु “कूँण” “नेरी” आदि
दो एक राजस्थानी शब्दो का प्रयोग भी हुआ है। पद की छठी पक्ति
मे “बेरी” शब्द का अर्थ स्पष्ट नही होता। बहुत संभव है कि बार बार
के अर्थ मे यहां “बेरी” का प्रयोग हुआ हो ।
२०
हरि तुम हरो जनु की भीर।
द्रौपदी की लाज राख्यो, तुम बढ़ायो चीर।
भक्त कारन रूप नरहरि, धार्यो आप सरीर।
हरिनकस्यप मार लीन्हो, धर्यो नाहि न धीर।
बूडते गजराज राख्यो, कियो बाहर नीर।
दास मीरा लाल गिरधर, दुख जहाँ तहाँ पीर। ।।३११।।
अन्तिम पक्ति के उत्तरार्द्ध मे प्रयुक्त “पीर” शब्द निरर्थक
ही प्रतीत होता है। बहुत सम्भव है कि “सीर” शब्द का एतदर्थ
द्योतक किसी अन्य शब्द का प्रयोग हुआ हो। “सीर” राजस्थानी
भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है “साथ” या “साथ देने वाला”। अत
अर्थ देखते हुए “सीर” का प्रयोग उपयुक्त ही लगता है। पाठान्तर मे
“सीर” का प्रयोग मिलता भी है।
पाठान्तर १,
हरी तुम हरौ जन की भीर।
द्रौपदी की लाज राखी, तुरत बढायो चीर।
भगत कारण रूप नरहरी धार्यो नोहिन धीर।
बूडतो गजराज राख्यो, कियो बाहर नीर।
दासी मीराँ लाल गिरधर, करण कँवल पै सीर।
पाठान्तर मे “सीर” शब्द “सिर” या “मस्तक” के ही अर्थ मे
आया है। कहना सम्भव नही कि कौन पाठ प्रामाणिक है।