मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
by भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव
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Read in contextसंघर्षाभिव्यक्ति १२९
किरपा करि मोहि अपनाई, सब दुख दियो मिटाय।
राणा जी विषरा प्याला भेज्यो, म्हे सिर लियो चढाय।
चरणामृत को नामज लीनो पीगी प्रेम बहाय।
पीवत ही अति चढि खुमारी अब थिर रह्यो न जाय।
जिन मीराँ मनवारी कीन्ही, पूरब जनम के भाय।
पद के तीनो ही पाठो पर सत मत का प्रभाव दृष्टिगत होता है।
यह प्रभाव पहले और दूसरे पाठान्तरो पर कुछ विशेष स्पष्ट हो जाता
है। पहले और दूसरे पाठान्तरो मे 'जिन मीराँ' का प्रयोग भी
विचारणीय है। राजस्थानी गेय परम्परा के अनुसार लय संगति के
हेतु जिण शब्द का जिन हो जाना स्वाभाविक है।
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गिरधर के मन भाई हो राणा जी!
लोकलाज कुल की मरजादा, मै तो छोडी है सकल बड़ाई।
पूरब जनम की मै तो गोपिका चूक पडी मुझ मांही।
जगत लहर व्यापी घट भीतर दीनी हरि छिटकाई।
जैमल के घर जनम लियो है राणा ने परणाई।
भोग रोग होय लागा मोरी सजनी गति प्रगट होय आई।
मात पिता सुत बाधव भाई, या सब झूठी सगाई।
परम सनेही प्रीतम प्यारो, जासूं मै प्रीत लगाई।
जो थे पकडोरा हाथ हमारो तो खबरदार मनमाही।
देवगी सराप मै साचां मन सूं, कल जल भसम होय जाई।
जनम जनम की दासी राम की थांरी नही लुगाई।
थारे मारे१ फीरो सो२ सगपण३ गावै मीराँबाई ॥२०६॥+
अभिव्यक्ति के आधार पर ही पद की प्रमाणिकता विशेष रुपेण
संदिग्ध है। "जैमल घर जन्म लियो है" जैसी अभिव्यक्ति का कोई
१ म्हारे राजस्थानी के अनुसार शुद्ध है, २ फीरोसो (फिरोसो)
हलका सा, ३ सम्बन्ध।
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