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मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary

by भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव

DevanagariRajasthanipublished365 pages

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८० मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
आम की डार कोयलिया बोलै, बोलत सब्द उदासी ।
मेरे तो मन ऐसी आवे, करवत लेहो कासी ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर लाल, चरण कँवल की उदासी ॥१३१॥†
पद की प्रथम पंक्ति सूरदास के पद से हू बहू मिलती है। अन्तिम
पंक्ति मे प्रयुक्त 'उदासी' प्रयोग विचारणीय है।
१७
मन हमारा बाध्यो भाई, कँवल नैन अपने गुन ।
तीषण तीर बेध शरीर, दूरि गयो भाई, लाग्यो तब ।
जाण्यो नाही, अब न सह्यो जाई री भाई ।
तत मत औषध कर तक परि न जाई, है कोऊ ।
उपकार करै, कठिन दर्द री भाई ।
निकटि हो तुम दूरि नाहि, बेगि मिलो आई, मीराँ ।
गिरधर स्वामी दयाल, तनकी तपति बुझाई रे भाई ।
कमल नैन अपने गुन बाध्यो भाई ॥१३२॥†
श्री सूर्यनारायण जी चतुर्वेदी से मिला यह पद "ग्रंथ साहिब,
भाई बन्दे की बीड़" से उद्धृत है।
पद की दूसरी, चौथी और छठी पंक्तियो का अन्तिम हिस्सा क्रमश.
तीसरी पाँचवी और सातवीं के प्रारम्भ मे लगा कर पढ़ने से अर्थ संगति
ठीक से बैठ जाती है, अन्यथा नही ।
१८
बिरहनी बावरी सी भई ।
ऊँची चढ चढ अपने भवन मे टेरत हाय दई ।
ले अँचरा मुख अँसुवन पोछत उघरे गात सही ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, बिछुरत कछु ना कही ॥१३३॥
'बिछुरत कछु ना कही' जैसी अभिव्यक्ति इस पद की
विशषता है ।