मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
by भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव
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Read in context६६ मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह
नान्ही बूँदन मेहा बरसै, ऊपर से सुरपति गरजै, हे मा।
सूनी सेज स्याम बिन लागत,कूक उठी पिया पिया करि के,हे मा।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, मोय¹ विधाता क्यूँ सरजी², हे मा।
॥९८॥
१८
ऐसी ऐसी चादनी मे पिया घर नाईं।
चार पहर दिन सोचत बीत्या, तडपत रैन बिहाई।
मै सूती पिया अपने महल मे, खालूडा³ मे आई सरदाई४।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, हरख निरख गुण गाई ॥९९॥†
पद मे पूर्वापर सबंध का सर्वथा अभाव है। पद की तीसरी पंक्ति
सर्वथा अर्थहीन है। अभिव्यक्ति मे भी कोई गम्भीरता नही। ऐस
पदो को प्रक्षिप्त मान लेना ही युक्तियुक्त प्रतीत होता है।
१९
मोसी दुखियाँ कूँ, लोग सुखिया कहत है।
ऐसो री अड़ीलो कथ, दियो है विधाता मोकूँ।
सेजहूँ न आवै प्यारो, न्यारौ ही रहत हं ।
तारा तो अगारा भया, सेज भई भाषा सी।
पिया को पिलंगू मानो, आगि जूं रहत है।
जारे बारे बाष में तो, भीतर बेहाल भई।
बिरह की करवत, मेरे हिया में बहत है।
द्यौस५ तो यूँ ही गयौ, रैनिहू बिहानी है।
मीराँ तो बेहाल भई, दरस कूँ चहात है। ॥१००॥†
१ मुझको, २ सृजन किया, बनाया, ३ कमरा, ४ ठंड, ५ दिन,