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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 977 of 1098

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Page 977

* अध्याय २५० * ९६७


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अर्थोऽनर्थक्रियां याति दुर्भागाणां यथा विभो।<br>दुर्बलानां च संकल्पो यथा भवति चापदि ॥ ४७<br>विषमेतत् समुद्भूतं तस्माद् वामृतकाङ्क्षया।<br>अस्माद् भयान्मोचय त्वं गतिस्त्वं च परायणम् ॥ ४८<br>भक्तानुकम्पी भावज्ञो भुवनादीश्वरो विभुः।<br>यज्ञाग्रभुक् सर्वहविः सौम्यः सोमः स्मरान्तकृत् ॥ ४९<br>त्वमेको नो गतिर्देव गीर्वाणगणशर्मकृत्।<br>रक्षास्मान् भक्षसंकल्पाद् विरूपाक्ष विषज्वरात् ॥ ५०<br>तच्छ्रुत्वा भगवानाह भगनेत्रान्तकृद् भवः ॥ ५१भगवन् ! जिस प्रकार अभागोंके अर्थ भी अनर्थके कारण बन जाते हैं तथा आपत्तिकालमें दुर्बलोंके संकल्प विपरीत फल देनेवाले हो जाते हैं, उसी प्रकार अमृतकी अभिलाषासे युक्त हमलोगोंके लिये यह विष उत्पन्न हुआ है। अतः आप इस भयसे हमलोगोंको मुक्त कीजिये, आप ही एकमात्र हम सबके शरणदाता हैं। आप भक्तोंपर अनुकम्पा करनेवाले, मनके भावोंके ज्ञाता, सभी भुवनोंके ईश्वर, सर्वव्यापक, यज्ञोंमें सर्वप्रथम भाग ग्रहण करनेवाले, सकल हवनीय द्रव्यस्वरूप, सौम्य, उमाके साथ स्थित और कामदेवके विनाशक हैं। देवताओंका कल्याण करनेवाले देव ! एकमात्र आप ही हमलोगोंके शरणदाता हैं। विरूपाक्ष! (सबको) खा लेनेके विचारवाले इस विषके कष्टसे हमलोगोंकी रक्षा कीजिये। यह सुनकर भगदेवताके नेत्रोंका विनाश करनेवाले भगवान् शंकरने कहा॥ ४७—५१॥
देवदेव उवाच<br>भक्षयिष्याम्यहं घोरं कालकूटं महाविषम्।<br>तथान्यदपि यत्कृत्यं कृच्छ्रसाध्यं सुरासुराः।<br>तच्चापि साधयिष्यामि तिष्ठध्वं विगतज्वराः ॥ ५२**देवाधिदेव बोले—**देवासुरगण! मैं उस कालकूट नामक महान् भयंकर विषको तो पी ही जाऊँगा, इसके अतिरिक्त तुमलोगोंका जो कोई अन्य भी कष्टसाध्य कार्य होगा, उसे भी सिद्ध कर दूँगा, तुम लोग चिन्तारहित हो जाओ।
इत्युक्ता हृष्टरोमाणो वाष्पगद्गदकण्ठिनः।<br>आनन्दाश्रुपरीताक्षाः सनाथा इव मेनिरे।<br>सुरा ब्रह्मादयः सर्वे समाश्वस्ताः सुमनासाः ॥ ५३इस प्रकार कहे जानेपर ब्रह्मा आदि सभी देवताओंका मन प्रसन्न हो गया, वे भलीभाँति आश्वस्त हो गये, उनके शरीर रोमाञ्चित हो उठे, कण्ठ आँसुओंसे गद्गद हो गये, नेत्रोंमें आनन्दाश्रु छलक आये और वे उस समय अपनेको सनाथ मानने लगे।
ततोऽव्रजद् द्रुतगतिना ककुद्मिना<br>हरोऽम्बरे पवनगतिर्जगत्पतिः।<br>प्रधावितैरसुरसुरेन्द्रनायकैः<br>स्ववाहनैर्विचलितशुभ्रचामरैः।<br>पुरःसरैः स तु शुशुभे शुभाश्रयैः<br>शिवो वशी शिखिकपिशोर्ध्वजूतकः ॥ ५४तदनन्तर जगत्पति भगवान् शंकर वेगशाली नन्दिकेश्वरपर आरूढ़ होकर वायुके समान वेगसे आकाशमार्गसे उस ओर चले। उस समय असुरों तथा सुरोंके अधिपतिगण अपने-अपने वाहनोंपर आरूढ़ हो चमर डुलाते हुए उनके आगे-आगे दौड़ रहे थे। इस प्रकार अग्निकी ज्वालासे भूरे रंगवाली जटासे युक्त इन्द्रियजयी भगवान् शिव मङ्गलके आधारस्वरूप उन देवताओंके साथ शोभायमान हो रहे थे।
आसाद्य दुग्धसिन्धुं तं कालकूटं विषं यतः।<br>ततो देवो महादेवो विलोक्य विषमं विषम् ॥ ५५<br>छायास्थानकमास्थाय सोऽपिबद् वामपाणिना।<br>पीयमाने विषे तस्मिंस्ततो देवा महासुराः ॥ ५६<br>जगुश्च ननृतुश्चापि सिंहनादांश्च पुष्कलान्।<br>चक्रुः शक्रमुखाद्याश्च हिरण्याक्षादयस्तथा ॥ ५७तदनन्तर वे जहाँसे कालकूट विष उत्पन्न हुआ था, उस क्षीरसागरपर पहुँचे। तत्पश्चात् भगवान् महादेवने उस विषम विषको देखकर एक छायायुक्त स्थानमें बैठकर अपने बायें हाथसे उसे पी लिया। उस विषके पी लिये जानेपर इन्द्रादि देव तथा हिरण्याक्ष प्रभृति असुर हर्षपूर्वक नाचने-गाने और भयंकर सिंहनाद