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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 971 of 1098

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Page 971
* अध्याय २४९ *९६१

| यथामृतत्वं देवेश तथा नः कुरु माधव।<br>त्वया विना न तच्छक्यमस्माभिः कैटभार्दन॥ ४८<br>प्राप्तुं तदमृतं नाथ ततोऽग्रे भव नो विभो।<br>इत्युक्तश्च ततो विष्णुरप्रधृष्योऽरिमर्दनः॥ ४९<br>जगाम देवैः सहितो यत्रासौ मन्दराचलः।<br>वेष्टितो भोगिभोगेन धृतश्चामरदानवैः॥ ५०<br>विषभीतास्ततो देवा यतः पुच्छं ततः स्थिताः।<br>मुखतो दैत्यसंघास्तु सैंहिकेयपुरःसराः॥ ५१<br>सहस्रवदनं चास्य शिरः सव्येन पाणिना।<br>दक्षिणेन बलिर्देहं नागस्याकृष्टवांस्तथा॥ ५२<br>दधारामृतमन्थानं मन्दरं चारुकन्दरम्।<br>नारायणः स भगवान् भुजयुग्मद्वयेन तु॥ ५३<br>ततो देवासुरैः सर्वैर्जयशब्दपुरःसरम्।<br>दिव्यं वर्षशतं साग्रं मथितः क्षीरसागरः॥ ५४<br>ततः श्रान्तास्तु ते सर्वे देवा दैत्यपुरःसराः।<br>श्रान्तेषु तेषु देवेन्द्रो मेघो भूत्वाम्बुशीकरान्॥ ५५<br>ववर्षामृतकल्पांस्तान् ववौ वायुश्च शीतलः।<br>भग्नप्रायेषु देवेषु शान्तेषु कमलासनः॥ ५६<br>मथ्यतां मथ्यतां सिन्धुरित्युवाच पुनः पुनः।<br>अवश्यमुद्योगवतां श्रीरपारा भवेत् सदा॥ ५७<br>ब्रह्मप्रोत्साहिता देवा ममन्थुः पुनरम्बुधिम्।<br>भ्राम्यमाणे ततः शैले योजनायुतशेखरे॥ ५८<br>निपेतुर्हस्तियूथानि वराहशरभादयः।<br>श्वापदायुतलक्षाणि तथा पुष्पफलद्रुमाः॥ ५९<br>ततः फलानां वीर्येण पुष्पौषधिरसेन च।<br>क्षीरमम्बुधिजं सर्वं दधिरूपमजायत॥ ६०<br>ततस्तु सर्वजीवेषु चूर्णितेषु सहस्रशः।<br>तदम्बुमेदसोत्सर्गाद् वारुणी समपद्यत॥ ६१<br>वारुणीगन्धमाघ्राय मुमुदुर्देवदानवाः।<br>तदास्वादेन बलिनो देवदैत्यादयोऽभवन्॥ ६२ | समुद्रका मन्थन करना चाहते हैं। भगवान् माधव! हमें जिस उपायसे अमरत्वकी प्राप्ति हो सके, आप वैसा करें। कैटभशत्रो! आपके बिना हमलोग उस अमृतको प्राप्त नहीं कर सकते, अतः सर्वव्यापी नाथ! आप हमलोगोंके अग्रणी बनें।' उनके ऐसा कहनेपर शत्रुनाशक अजेय भगवान् विष्णु देवताओंके साथ उस स्थानपर गये, जहाँ मन्दराचल था। उस समय वह मन्दराचल शेषनागके फणोंसे लिपटा हुआ था तथा देवता और दानवगण उसे पकड़े हुए थे। उस समय विषके भयसे डरकर देवगण तो नागकी पूँछकी ओर और राहुको अगुआ बनाकर दैत्यगण मुखकी ओर स्थित थे। बलि शेषनागके हजार मुखवाले सिरको बायें हाथसे तथा देहको दाहिने हाथसे पकड़कर खींच रहा था। भगवान् नारायणने सुन्दर कन्दराओंसे सुशोभित अमृतके मन्थन-दण्डस्वरूप मन्दराचलको अपनी दोनों भुजाओंसे पकड़ा। इस प्रकार सभी देवताओं तथा दैत्योंने मिलकर जय-जयकार करते हुए सौ दिव्य वर्षोंसे भी अधिक कालतक क्षीरसागरका मन्थन करते रहे, तब दैत्योंसहित वे सभी देवता थक गये। उन लोगोंके थक जानेपर देवराज इन्द्र मेघरूप धारणकर उनके ऊपर अमृतके समान जलकणोंकी वृष्टि करने लगे और शीतल वायु बहने लगी॥ ४६–५५ १/२ ॥<br><br>उस समय प्रायः सभी देवताओंके शिथिल एवं शान्त हो जानेपर ब्रह्मा पुनः-पुनः इस प्रकार कहने लगे—'अरे! समुद्रका मन्थन करते चलो। उद्योगी पुरुषोंको सदा अपार लक्ष्मी अवश्य प्राप्त होती है।' ब्रह्माद्वारा इस प्रकार उत्साहित किये जानेपर देवासुरगण पुनः समुद्रका मन्थन करने लगे। इसके बाद दस हजार योजन विस्तृत शिखरवाले मन्दराचलके घुमाये जानेपर (उसके शिखरोंपरसे) हाथियोंके समूह, शूकर, अष्टापद शरभ करोड़ों हिंसक पशु आदि तथा पुष्पों और फलोंसे लदे हुए वृक्ष समुद्रमें गिरने लगे। उन गिरे हुए फलोंके सारभाग तथा पुष्पों और ओषधियोंके रससे क्षीरसागरका जल दहीके रूपमें परिवर्तित हो गया। तदनन्तर उन सभी जीवोंके हजारों प्रकारसे चूर्ण हो जानेपर उनकी मज्जा और जलके संयोगसे वारुणी उत्पन्न हुई। उस वारुणीकी गन्धको सूँघकर देवता और दानव परम प्रसन्न हुए और उसके आस्वादनसे वे बलवान् हो गये। |