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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 965 of 1098

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Page 965
* अध्याय २४८ *९५५

| वसन्ति त्वयि भूतानि ब्रह्मादीनि युगक्षये ॥ ४५<br>त्वं वा वससि भूतेषु वासुदेवस्तथोच्यसे ।<br>संकर्षयसि भूतानि कल्पे कल्पे पुनः पुनः ॥ ४६<br>ततः संकर्षणः प्रोक्तस्तत्त्वज्ञानविशारदैः ।<br>प्रतिव्यूहेन तिष्ठन्ति सदेवासुरराक्षसाः ॥ ४७<br>प्रविद्युः सर्वधर्माणां प्रद्युम्नस्तेन चोच्यसे ।<br>निरोद्धा विद्यते यस्मान्न ते भूतेषु कश्चन ॥ ४८<br>अनिरुद्धस्ततः प्रोक्तः पूर्वमेव महर्षिभिः ।<br>यत् त्वया धार्यते विश्वं त्वया संह्रियते जगत् ॥ ४९<br>त्वं धारयसि भूतानि भुवनं त्वं बिभर्षि च ।<br>यत् त्वया धार्यते किंचित् तेजसा च बलेन च ॥ ५०<br>मया हि धार्यते पश्चान्नाधृतं धारये त्वया ।<br>न हि तद् विद्यते भूतं त्वया यन्नात्र धार्यते ॥ ५१<br>त्वमेव कुरुषे देव नारायण युगे युगे ।<br>मम भारावतरणं जगतो हितकाम्यया ॥ ५२<br>तवैव तेजसाऽऽक्रान्तां रसातलतलं गताम् ।<br>त्रायस्व मां सुरश्रेष्ठ त्वामेव शरणं गताम् ॥ ५३<br>दानवैः पीड्यमानाहं राक्षसैश्च दुरात्मभिः ।<br>त्वामेव शरणं नित्यमुपयामि सनातनम् ॥ ५४<br>तावन्मेऽस्ति भयं देव यावन्न त्वां ककुद्मिनम् ।<br>शरणं यामि मनसा शतशोऽप्युपलक्षये ॥ ५५<br>उपमानं न ते शक्ताः कर्तुं सेन्द्रा दिवौकसः ।<br>तत्त्वं त्वमेव तद् वेत्सि निरुत्तरमतः परम् ॥ ५६ | युगान्तके समय ब्रह्मा आदि सभी प्राणी आपमें निवास करते हैं और आप प्राणियोंमें निवास करते हैं, इसीलिये आप ‘वासुदेव’ कहलाते हैं। प्रत्येक कल्पमें आप पुनः-पुनः प्राणियोंको आकर्षित करते हैं, इसीलिये तत्त्वज्ञानविशारदोंने आपको ‘संकर्षण’ कहा है। आपके प्रभावसे देवता, असुर और राक्षस अपने-अपने व्यूहोंमें स्थित रहते हैं तथा आप सभी धर्मोंके विशेषज्ञ हैं, अतः ‘प्रद्युम्न’ नामसे कहे जाते हैं। चूँकि सभी प्राणियोंमें कोई भी आपका निरोध करनेवाला नहीं है, इसीलिये महर्षियोंने पहलेसे ही आपका ‘अनिरुद्ध’ नाम रख दिया है। आप विश्वको धारण करते हैं, आप ही जगत्‌का संहार भी करते हैं, आप ही प्राणियोंको धारण करते हैं और आप ही भुवनका पालन-पोषण करते हैं। आप अपने तेज और बलसे जो कुछ धारण करते हैं, उसीको पीछे मैं भी धारण करती हूँ। आपके द्वारा धारण न की हुई वस्तुको मैं धारण नहीं करती। ऐसा कोई भी प्राणी नहीं है, जिसे आपने इस जगत्‌में धारण न किया हो। नारायण देव! आप ही प्रत्येक युगमें संसारकी कल्याण-भावनासे मेरे ऊपर पड़नेवाले असहनीय भारको दूर करते हैं। मैं आपके ही तेजसे आक्रान्त हो रसातलमें पहुँच गयी हूँ। सुरश्रेष्ठ! मैं आपकी शरणागत हूँ, आप मेरी रक्षा कीजिये। मैं दुरात्मा दानवों एवं राक्षसोंसे पीड़ित होकर नित्य आप सनातनकी ही शरणमें जाती हूँ। देव! मेरे लिये भय तभीतक रहता है, जबतक मैं मनसे आप ककुद्मीकी शरणमें नहीं आती हूँ। मैंने सैकड़ों बार ऐसा देखा है। इन्द्रसहित समस्त देवगण आपकी समानता करनेमें समर्थ नहीं हैं। आप ही उस परम तत्त्वके ज्ञाता हैं। इसके बाद अब मुझे कुछ नहीं कहना है॥ ४५–५६॥ |
| शौनक उवाच<br>ततः प्रीतः स भगवान् पृथिव्यै शार्ङ्गचक्रधृक् ।<br>काममस्या यथाकाममभिपूरितवान् हरिः ॥ ५७<br>अब्रवीच्च महादेवि माधवीयं स्तवोत्तमम् ।<br>धारयिष्यति यो मर्त्यो नास्ति तस्य पराभवः ॥ ५८<br>लोकान् निष्कल्मषांश्चैव वैष्णवान् प्रतिपत्स्यते ।<br>एतदाश्चर्यसर्वस्वं माधवीयं स्तवोत्तमम् ॥ ५९<br>अधीतवेदः पुरुषो मुनिः प्रीतमना भवेत् ॥ ६०<br>मा भैर्धरणि कल्याणि शान्तिं व्रज ममाग्रतः ।<br>एष त्वामुचितं स्थानं प्रापयामि मनीषितम् ॥ ६१ | शौनकजीने कहा— तदनन्तर शार्ङ्गधनुष और चक्र धारण करनेवाले भगवान् विष्णुने पृथ्वीपर प्रसन्न होकर उसके यथेष्ट मनोरथको पूर्ण कर दिया। तत्पश्चात् उन्होंने कहा—‘महादेवि! जो मनुष्य इस उत्तम माधवीय स्तोत्रको धारण करेगा, उसका कभी पराभव नहीं होगा। वह पापरहित वैष्णव-लोकोंको प्राप्त होगा। यह उत्तम माधवीय स्तोत्र सभी आश्चर्योंसे परिपूर्ण है। वेदाध्यायी पुरुष और मुनि इससे प्रसन्न हो जाते हैं। धरणि! तुम भय मत करो। कल्याणि! तुम मेरे सामने शान्ति धारण करो। मैं तुम्हें मनसेप्सित उचित स्थान प्राप्त कराऊँगा’॥ ५७–६१॥ |