Skip to content
SarvaKosh
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 944 of 1098

Read in context
Page 944

९३४ * मत्स्यपुराण *

न ते ग्लानिर्न ते खेदो गर्भस्थे भविता मयि।<br>दाक्षायणि प्रसादं ते करोम्यन्यैः सुदुर्लभम्॥ ४७<br>गर्भस्थे मयि पुत्राणां तव योऽरिर्भविष्यति।<br>तेजसस्तस्य हानिं च करिष्ये मा व्यथां कृथाः॥ ४८<br><br>शौनक उवाच<br>एवमुक्त्वा ततः सद्यो यातोऽन्तर्धानमीश्वरः।<br>सापि कालेन तं गर्भमवाप कुरुसत्तम॥ ४९<br>गर्भस्थिते ततः कृष्णे चचाल सकला क्षितिः।<br>चकम्पिरे महाशैलाः क्षोभं जग्मुस्तथाब्धयः॥ ५०<br>यतो यतोऽदितिर्याति ददाति ललितं पदम्।<br>ततस्ततः क्षितिः खेदान्नाम वसुधाधिप॥ ५१<br>दैत्यानामथ सर्वेषां गर्भस्थे मधुसूदने।<br>बभूव तेजसां हानिर्यथोक्तं परमेष्ठिना॥ ५२अब तुम्हें विकल नहीं होना चाहिये। तुम्हारे गर्भमें मेरे स्थित होनेपर तुम्हें न तो ग्लानि होगी, न खेद होगा। दाक्षायणि! मैं तुमपर ऐसी कृपा करूँगा जो दूसरोंके लिये परम दुर्लभ है। मेरे गर्भमें स्थित रहनेपर तुम्हारे पुत्रोंका जो शत्रु होगा उसके तेजोबलको मैं विनष्ट कर दूँगा। तुम दुःख मत करो॥ ४५–४८॥<br><br>शौनकजी बोले—कुरुश्रेष्ठ! ऐसा कहकर भगवान् तुरंत अन्तर्हित हो गये। समयानुसार अदिति ने भी उस गर्भको धारण किया। भगवान् विष्णुके गर्भस्थित होनेपर सारी पृथ्वी डगमगाने लगी, बड़े-बड़े पर्वत काँपने लगे तथा समुद्रमें ज्वार-भाटा उठने लगा। वसुधाधिप! अदिति जिधर-जिधर जाती थीं और अपना सुन्दर पद रखती थीं, वहाँ-वहाँ भारके कारण पृथ्वी विनम्र हो जाती थी। भगवान् विष्णुके गर्भस्थ होनेपर सभी दैत्योंके तेज बिलकुल मन्द हो गये, जैसा कि भगवान्ने अदितिसे पहले कहा था॥ ४९–५२॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे वामनप्रादुर्भावेऽदितिवरप्रदानं नाम चतुश्चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २४४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें वामनप्रादुर्भाव-प्रसंगमें अदितिको वरदान नामक दो सौ चौवालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २४४॥


दो सौ पैंतालीसवाँ अध्याय

बलिद्वारा विष्णुकी निन्दापर प्रह्लादका उन्हें शाप, बलिका अनुनय, ब्रह्माजीद्वारा वामनभगवान्‌का स्तवन, भगवान् वामनका देवताओंको आश्वासन तथा उनका बलिके यज्ञके लिये प्रस्थान

शौनक उवाच<br>निस्तेजसोऽसुरान् दृष्ट्वा समस्तानसुरेश्वरः।<br>प्रह्रादमथ पप्रच्छ बलिरात्मपितामहम्॥ १<br><br>बलिरुवाच<br>तात निस्तेजसो दैत्या निर्दग्धा इव वह्निना।<br>किमेते सहसैवाद्य ब्रह्मदण्डहता इव॥ २<br>अरिष्टं किं नु दैत्यानां किं कृत्या वैरिनिर्मिता।<br>नाशायैषा समुद्भूता यया निस्तेजसोऽसुराः॥ ३शौनकजीने कहा—असुरराज बलिने समस्त दैत्योंको निस्तेज देखकर अपने पितामह प्रह्लादसे प्रश्न किया॥ १॥<br><br>बलिने पूछा—तात! क्या बात है कि आज सहसा ये दैत्यगण अग्निसे जले हुएके समान निस्तेज और ब्रह्मदण्डसे मारे हुएकी भाँति निर्बल दिखायी पड़ने लगे हैं? क्या दैत्योंके ऊपर कोई अरिष्ट आ गया है? या वैरियाेंद्वारा निर्मित कोई कृत्या इनका विनाश करनेके लिये प्रकट हुई है, जिससे ये असुर तेजोहीन हो गये हैं?॥ २-३॥