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Read in context९१० * मत्स्यपुराण *
| ऋतुस्वभावेन विनाद्भुतस्य<br>जातस्य दृष्टस्य तु शीघ्रमेव।<br>यथागमं शान्तिरनन्तरं तु<br>कार्या यथोक्ता वसुधाधिपेन॥ २६॥ | विकारोंका हो जाना—ये उत्पात शिशिर-ऋतुमें शुभदायी माने गये हैं। इन ऋतु-स्वभावके अतिरिक्त अन्य उत्पन्न हुए अद्भुत उत्पातके देखे जानेके बाद राजाको शीघ्र ही शास्त्रानुकूल कही गयी शान्तिका विधान करना चाहिये॥ १४—२६॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽद्भुतशान्तिकोत्पत्तिर्नामैकोनत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २२९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अद्भुत उत्पातोंकी शान्ति नामक दो सौ उनतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २२९॥
दो सौ तीसवाँ अध्याय
अद्भुत उत्पातके लक्षण तथा उनकी शान्तिके उपाय
| गर्ग उवाच<br>देवतार्चाः प्रनृत्यन्ति वेपन्ते प्रज्वलन्ति च।<br>वमन्त्यग्निं तथा धूमं स्नेहं रक्तं तथा वसाम्॥ १<br>आरटन्ति रुदन्त्येताः प्रस्विद्यन्ति हसन्ति च।<br>उत्तिष्ठन्ति निषीदन्ति प्रधावन्ति धमन्ति च॥ २<br>भुञ्जते विक्षिपन्ते वा कोशप्रहरणध्वजान्।<br>अवाङ्मुखा वा तिष्ठन्ति स्थानात् स्थानं भ्रमन्ति च॥ ३<br>एवमाद्या हि दृश्यन्ते विकाराः सहसोत्थिताः।<br>लिङ्गायतनविप्रेषु तत्र वासं न रोचयेत्॥ ४<br>राज्ञो वा व्यसनं तत्र स च देशो विनश्यति।<br>देवयात्रासु चोत्पातान् दृष्ट्वा देशभयं वदेत्॥ ५ | गर्गजी बोले— जब देव-मूर्तियाँ नाचने लगती हैं, काँपती हैं, जल उठती हैं, अग्नि, धुआँ, तेल, रक्त और चर्बी उगलने लगती हैं, जोर-जोरसे चिल्लाती हैं, रोती हैं, पसीना बहाने लगती हैं, हँसती हैं, उठती हैं, बैठती हैं, दौड़ने लगती हैं, मुँह बजाने लगती हैं, खाती हैं, कोश, अस्त्र और ध्वजाओंको फेंकने लगती हैं, नीचे मुख किये बैठी रहती हैं अथवा एक स्थानसे दूसरे स्थानपर भ्रमण करने लगती हैं—इस प्रकारके सहसा उत्पन्न हुए उत्पात यदि शिव-लिङ्ग, देवमन्दिर तथा ब्राह्मणोंके पुरमें दिखायी पड़ें तो उस स्थानपर निवास नहीं करना चाहिये। ऐसे उत्पातोंके होनेपर या तो राजापर कोई बड़ी आपत्ति आती है अथवा उस देशका विनाश होता है। देवताके दर्शनके लिये जाते समय यदि उपर्युक्त उत्पात दिखायी पड़ें तो उस देशको भय बतलाना चाहिये॥ १—५॥ |
| पितामहस्य हर्म्येषु तत्र वासं न रोचयेत्।<br>पशूनां रुद्रजं ज्ञेयं नृपाणां लोकपालजम्॥ ६<br>ज्ञेयं सेनापतीनां तु यत् स्यात् स्कन्दविशाखजम्।<br>लोकानां विष्णुवस्विन्द्रविश्वकर्मसमुद्भवम्॥ ७<br>विनायकोद्भवं ज्ञेयं गणानां ये तु नायकाः।<br>देवप्रेष्यान् नृपप्रेष्या देवस्त्रीभिर्नृपस्त्रियः॥ ८<br>वासुदेवोद्भवं ज्ञेयं ग्रहाणामेव नान्यथा।<br>देवतानां विकारेषु श्रुतिवेत्ता पुरोहितः॥ ९ | गृहसम्बन्धी उत्पातोंको ब्रह्मासे सम्बद्ध जानना चाहिये, अतः वहाँ निवास न करे। पशुओंके उत्पातोंको रुद्रसे उत्पन्न और राजाओंके उत्पातोंको लोकपालसे उत्पन्न जानना चाहिये। सेनापतियोंके उत्पातोंको स्कन्द तथा विशाखसे उत्पन्न तथा लोकोंके उत्पातोंको विष्णु, वसु, इन्द्र और विश्वकर्मासे उद्भूत समझना चाहिये। जो गणोंके नायक हैं, उनपर घटित होनेवाला उत्पात विनायकसे उद्भूत जानना चाहिये। देवदूतोंकी अप्रसन्नतासे राजदूतोंपर तथा देवाङ्गनाओंके द्वारा राजपत्नियोंपर उत्पात घटित होते हैं। ग्रहोंके उपद्रवको भगवान् वासुदेवसे उत्पन्न हुआ समझना चाहिये। महाभाग! देवताओंमें |