मत्स्य महापुराण

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| ९०८ | * मत्स्यपुराण * |
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दो सौ उनतीसवाँ अध्याय
उत्पातोंके भेद तथा कतिपय ऋतुस्वभावजन्य शुभदायक अद्भुतोंका वर्णन
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| मनुरुवाच<br>अद्भुतानां फलं देव शमनं च तथा वद।<br>त्वं हि वेत्सि विशालाक्ष ज्ञेयं सर्वमशेषतः॥ १ | मनुने पूछा—विशाल नेत्रोंवाले देव! अब मुझे इन अद्भुतोंका फल तथा उनकी शान्तिका उपाय बतलाइये; क्योंकि आप सभी ज्ञेय विषयोंके पूर्ण ज्ञाता हैं॥ १॥ |
| मत्स्य उवाच<br>अत्र ते वर्णयिष्यामि यदुवाच महातपाः।<br>अत्रये वृद्धगर्गस्तु सर्वधर्मभृतां वरः॥ २<br>सरस्वत्याः सुखासीनं गर्गं स्रोतसि पार्थिव।<br>पप्रच्छासौ महातेजा अत्रिर्मुनिजनप्रियम्॥ ३ | मत्स्यभगवान्ने कहा—राजन्! इस विषयमें सभी धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महातपस्वी वृद्ध गर्गने अत्रिको जो कुछ कहा था, वह सब मैं तुम्हें बतला रहा हूँ। एक समय मुनिजनोंके प्रिय महर्षि गर्गाचार्य सरस्वती नदीके तटपर सुखपूर्वक बैठे हुए थे, उसी समय महातेजस्वी अत्रिने उनसे प्रश्न किया॥ २-३॥ |
| अत्रिरुवाच<br>नश्यतां पूर्वरूपाणि जनानां कथयस्व मे।<br>नगराणां तथा राज्ञां त्वं हि सर्वं वदस्व माम्॥ ४ | अत्रि ऋषिने पूछा—महर्षे! आप मुझे विनाशोन्मुख मनुष्यों, राजाओं तथा नगरोंके सभी पूर्वलक्षण बतलाइये॥ ४॥ |
| गर्ग उवाच<br>पुरुषापचारान्नियतमपरज्यन्ति देवताः।<br>ततोऽपरागाद् देवानामुपसर्गः प्रवर्तते॥ ५<br>दिव्यान्तरिक्षभौमं च त्रिविधं सम्प्रकीर्तितम्।<br>ग्रहर्क्षवैकृतं दिव्यमान्तरिक्षं निबोध मे॥ ६<br>उल्कापातो दिशां दाहः परिवेषस्तथैव च।<br>गन्धर्वनगरं चैव वृष्टिश्च विकृता तु या॥ ७<br>एवमादीनि लोकेऽस्मिन्नान्तरिक्षं विनिर्दिशेत्।<br>चरस्थिरभवो भौमो भूकम्पश्चापि भूमिजः॥ ८<br>जलाशयानां वैकृत्यं भौमं तदपि कीर्तितम्।<br>भौमे त्वल्पफलं ज्ञेयं चिरेण च विपच्यते॥ ९<br>अभ्रजं मध्यफलदं मध्यकालफलप्रदम्।<br>अद्भुते तु समुत्पन्ने यदि वृष्टिः शिवा भवेत्॥ १०<br>सप्ताहाभ्यन्तरे ज्ञेयमद्भुतं निष्फलं भवेत्।<br>अद्भुतस्य विपाकश्च विना शान्त्या न दृश्यते॥ ११ | गर्गजी बोले—अत्रिजी! मनुष्योंके अत्याचारसे निश्चय ही देवता प्रतिकूल हो जाते हैं। तत्पश्चात् उन देवताओंके अप्रसन्न होनेसे उत्पात प्रारम्भ होता है। वह उत्पात दिव्य, आन्तरिक्ष और भौम—तीन प्रकारका कहा गया है। ग्रहों और नक्षत्रोंके विकारको दिव्य उत्पात जानना चाहिये। अब मुझसे आन्तरिक्ष उत्पातका वर्णन सुनिये। उल्कापात, दिशाओंका दाह, मण्डलोंका उदय, आकाशमें गन्धर्व-नगरका दिखायी देना, खण्डवृष्टि, अनावृष्टि या अतिवृष्टि—इस प्रकारके उत्पातोंको इस लोकमें आन्तरिक्ष उत्पात कहना चाहिये। स्थावर-जंगमसे उत्पन्न हुआ उत्पात तथा भूमिजन्य भूकम्प भौम उत्पात हैं। जलाशयोंका विकार भी भौम उत्पात कहलाता है। भौम उत्पात होनेपर उसका थोड़ा फल जानना चाहिये, किंतु वह बहुत देरमें शान्त होता है। आन्तरिक्ष उत्पात मध्यम फल देनेवाला होता है और मध्यमकालमें परिणामदायी होता है। इस महोत्पातके उदय होनेपर यदि कल्याणकारिणी वृष्टि होती है तो यह समझ लेना चाहिये कि एक सप्ताहके भीतर यह उत्पात निष्फल हो जायगा, किंतु इस महान् उत्पातका अवसान शान्तिके बिना नहीं होता। |