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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 915 of 1098

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Page 915
* अध्याय २२८ *९०५

| अल्पदण्डेऽधिकं कुर्याद् विपुले चाल्पमेव च।<br>ऊनाधिकं तु तं दण्डं सभ्यो दद्यात् स्वकाद् गृहात्॥ २११<br>यावानवध्यस्य वधे तावान् वध्यस्य रक्षणे।<br>अधर्मो नृपतेर्दृष्ट एतयोरुभयोरपि॥ २१२<br>ब्राह्मणं नैव हन्यात्तु सर्वपापेष्ववस्थितम्।<br>प्रवासयेत् स्वकाद् राष्ट्रात् समग्रधनसंयुतम्॥ २१३<br>न जातु ब्राह्मणं वध्यात् पातकं त्वधिकं भवेत्।<br>यस्मात् तस्मात् प्रयत्नेन ब्रह्महत्यां विवर्जयेत्॥ २१४<br>अदण्ड्यान् दण्डयन् राजा दण्ड्यांश्चैवाप्यदण्डयन्।<br>अयशो महदाप्नोति नरकं चाधिगच्छति॥ २१५<br>ज्ञात्वापराधं पुरुषस्य राजा<br>कालं तथा चानुमतं द्विजानाम्।<br>दण्ड्येषु दण्डं परिकल्पयेत्तु<br>यो यस्य युक्तः स समीक्ष्य कुर्यात्॥ २१६ | थोड़ेसे अपराधमें अधिक दण्ड देनेवाले तथा भीषण अपराधमें अल्प दण्ड देनेवाले नायककर्ताको जितना कम या अधिक दण्ड हो, उसे अपने घरसे पूर्ण करना या अपराधीको लौटाना चाहिये। अवध्य अपराधीका वध करनेमें जितना पाप लगता है उतना ही पाप वध्यको छोड़ देनेमें लगता है। राजाको इन दोनों दशाओंमें समानरूपसे पापभागी होना पड़ता है। सभी प्रकारके पापोंमें अपराधी पाये गये ब्राह्मणको मृत्युदण्ड नहीं देना चाहिये, उसे सम्पूर्ण सम्पत्तिके साथ अपने राष्ट्रसे निर्वासित कर देना चाहिये। कभी भूलकर भी ब्राह्मणका वध नहीं करना चाहिये; क्योंकि इससे अधिक पाप होता है। इसलिये राजाको ब्रह्महत्यासे बचना चाहिये। अदण्डनीय पुरुषोंको दण्ड देने तथा दण्डनीयको दण्ड न देनेसे राजा महान् अयशका भागी बनता है और मरनेपर नरकगामी होता है। इसलिये राजा मनुष्यके अपराधको भलीभाँति जानकर तथा यथासमय ब्राह्मणोंकी अनुमति लेकर दण्डनीयोंके प्रति दण्डकी कल्पना करे और जो जिस प्रकारके दण्डका पात्र हो, उसकी भलीभाँति समीक्षा कर उसे उसी प्रकारका समुचित दण्ड दे॥ २०९—२१६॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे राजधर्मे दण्डप्रणयनं नाम सप्तविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २२७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके राजधर्म-कीर्तन-प्रसङ्गमें दण्डनीति नामक दो सौ सत्ताईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २२७॥


दो सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय

अद्भुत शान्तिका *वर्णन

मनुरुवाच<br>दिव्यान्तरिक्षभौमेषु या शान्तिरभिधीयते।<br>तामहं श्रोतुमिच्छामि महोत्पातेषु केशव॥ १मनुने पूछा—केशव! दिव्य, अन्तरिक्ष और पृथ्वीसम्बन्धी बड़े-बड़े अद्भुत उपद्रवोंके होनेपर जिस शान्तिका विधान किया जाता है, उसे मैं श्रवण करना चाहता हूँ॥ १॥
मत्स्य उवाच<br>अथातः सम्प्रवक्ष्यामि त्रिविधामद्भुतादिषु।<br>विशेषेण तु भौमेषु शान्तिः कार्या तथा भवेत्॥ २<br>अभया चान्तरिक्षेषु सौम्या दिव्येषु पार्थिव।<br>विजिगीषुः परं राजन् भूतिकामस्तु यो भवेत्॥ ३मत्स्यभगवान्‌ने कहा— राजन्! अब मैं उत्पातोंके समय की जानेवाली तीनों प्रकारकी शान्तियाँ बतला रहा हूँ। उनमें विशेषरूपसे पृथ्वी-सम्बन्धी महोत्पातोंके अवसरपर शान्ति करनी चाहिये। राजन्! अन्तरिक्ष-सम्बन्धी उत्पातोंके लिये अभया तथा दिव्य उत्पातोंके लिये सौम्या शान्ति करनी चाहिये। राजन्! जो विजयाभिलाषी तथा ऐश्वर्यकामी

* इन अद्भुतोंका वर्णन तथा इनकी शान्तियोंका विस्तृत विधान पञ्चम आथर्वण शान्तिकल्प एवं अथर्वपरिशिष्टादिमें है।