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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 909 of 1098

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Page 909
* अध्याय २२७ *८९१

| भर्तारं लङ्घयेद् या स्त्री ज्ञातिभिर्बलदर्पिता।<br>तां च निष्कासयेद् राजा संस्थाने बहुसंस्थिते ॥ १३२<br><br>हताधिकारां मलिनां पिण्डमात्रोपजीविनीम्।<br>वासयेत् स्वैरिणीं नित्यं सवर्णेनाभिदूषिताम् ॥ १३३<br><br>ज्यायसा दूषिता नारी मुण्डनं समवाप्नुयात्।<br>वासश्च मलिनं नित्यं शिखां सम्प्राप्नुयाद् दश ॥ १३४<br><br>ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः क्षत्रविट्शूद्रयोषितः।<br>व्रजन् दाप्यो भवेद् राज्ञा दण्डमुत्तमसाहसम् ॥ १३५<br><br>वैश्यागमे च विप्रस्य क्षत्रियस्यान्त्यजागमे।<br>मध्यमं प्रथमं वैश्यो दण्ड्यः शूद्रागमाद् भवेत् ॥ १३६<br><br>शूद्रः सवर्णागमने शतं दण्ड्यो महीक्षिता।<br>वैश्यस्तु द्विगुणं राजन् क्षत्रस्तु त्रिगुणं तथा ॥ १३७<br><br>ब्राह्मणश्च भवेद् दण्ड्यस्तथा राजंश्चतुर्गुणम्।<br>अगुप्तासु भवेद् दण्डः सुगुप्तास्वधिको भवेत् ॥ १३८ | जो स्त्री अपने जाति-भाइयोंके बलसे गर्वीली होकर अपने पतिको छोड़ देती है, उसे घरसे निकालकर अनेक व्यक्तियोंसे युक्त संस्थानमें रख दे। राजा सवर्ण पुरुषद्वारा दूषित कुलटा स्त्रीको सभी अधिकारोंसे वञ्चित कर मलिन बना दे और भोजनमात्रका प्रबन्ध कर घरमें पड़ा रहने दे। उत्तम कुल एवं जातिमें उत्पन्न हुई स्त्री यदि दूषित हुई हो तो उसकी दस चोटियाँ रखकर शेष बाल कटवा दे और नित्य मैला वस्त्र पहननेको दे। यदि ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य क्रमशः क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्रकी स्त्रीके साथ दुराचार करते हैं तो वे राजाद्वारा उत्तमसाहस नामक दण्डके भागी होते हैं। यदि ब्राह्मण वैश्य-स्त्रीके साथ और क्षत्रिय अन्त्यज-स्त्रीके साथ पापाचरण करते हैं तो उन्हें मध्यमसाहसका दण्ड देना चाहिये और यदि वैश्य शूद्रा स्त्रीके साथ व्यभिचार करता है तो उसे भी पूर्वोक्त रीतिके अनुसार उत्तमसाहसका दण्ड मिलना चाहिये। राजन्! यदि शूद्र अपनी जातिकी स्त्रीके साथ समागम करता है तो उसे राजाद्वारा सौ मुद्राओंका दण्ड मिलना चाहिये। इसी प्रकार सवर्णा स्त्रीके साथ पापाचरण करनेसे वैश्यको दो सौ, क्षत्रियको तीन सौ तथा ब्राह्मणको चार सौ मुद्राओंका दण्ड देनेका विधान है। ये दण्ड अरक्षित स्त्रीके साथ पापाचरण करनेपर बताये गये हैं, किंतु सुरक्षित स्त्रियोंके साथ दुराचार करनेपर इससे अधिक दण्ड देना चाहिये ॥ १२६-१३८ ॥ |
| माता पितृष्वसा श्वश्रूर्मातुलानी पितृव्यजा।<br>पितृव्यसखिशिष्यस्त्री भगिनी तत्सखी तथा।<br>भ्रातृभार्यागमे पूर्वाद् दण्डस्तु द्विगुणो भवेत् ॥ १३९<br><br>भागिनेयी तथा चैव राजपत्नी तथैव च।<br>तथा प्रव्रजिता नारी वर्णोत्कृष्टा तथैव च ॥ १४०<br><br>इत्यगम्याश्च निर्दिष्टास्तासां तु गमने नरः।<br>शिश्नस्योत्कर्तनं कृत्वा ततस्तु वधमर्हति ॥ १४१<br><br>चण्डालीं च श्वपाकीं च गच्छन् वधमवाप्नुयात् ॥ १४२<br><br>तिर्यग्योनिं च गोवर्ज्यं मैथुनं यो निषेवते।<br>वपनं प्राप्नुयाद् दण्डं तस्याश्च यवसोदकम् ॥ १४३ | माता, फूफी, सास, मामी, चचेरी बहन, चाचीकी सखी, शिष्यकी स्त्री, बहिन, उसकी सखी तथा भाईकी स्त्री—इन सबके साथ समागम करनेपर पूर्वकथित दण्डसे दुगुना दण्ड देना चाहिये। भानजेकी स्त्री, राजाकी पत्नी, संन्यासिनी तथा उच्चवर्णकी स्त्री—ये सभी अगम्या मानी गयी हैं। इन सबके साथ समागम करनेवाले व्यक्तिके लिंगको कटवाकर तत्पश्चात् उसे प्राण-दण्ड देना चाहिये। इसी प्रकार चाण्डालकी स्त्री तथा कुत्तेको खानेवालोंकी स्त्रीके साथ व्यभिचार करनेवालेको प्राण-दण्ड देना चाहिये। गौको छोड़कर अन्य तिर्यग् योनियोंमें सम्भोग करनेवाले व्यक्तिको मुण्डनका दण्ड देकर उस पशुके लिये घास तथा जल देनेका दण्ड देना चाहिये। |