मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
by महर्षि वेदव्यास
DevanagariHindipublished1,098 pages
Page 887 of 1098
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- अध्याय २१९ * ८७७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| भुवं विलिखति ग्रीवां तथा चालयते नृप।<br>कण्डूयति च मूर्धानं परिलोड्याननं तथा॥ १३<br>क्रियासु त्वरितो राजन् विपरीतास्वपि ध्रुवम्।<br>एवमादीनि चिह्नानि विषदस्य परीक्षयेत्॥ १४<br>समीपैर्विक्षिपेद् वह्नौ तदन्नं त्वरान्वितः।<br>इन्द्रायुधसवर्णं तु रूक्षं स्फोटसमन्वितम्॥ १५<br>एकावर्तं तु दुर्गन्धि भृशं चटचटायते।<br>तद्धूमसेवनाजन्तोः शिरोरोगश्च जायते॥ १६ | करनेवाला होता है। राजन्! वह पृथ्वीपर रेखा खींचने लगता है, गर्दन हिलाने लगता है तथा मुखको मलकर सिर खुजलाने लगता है। राजन्! निश्चय ही वह विपरीत कार्योंमें भी शीघ्रता करनेकी चेष्टा करता है। विषदाताके ऐसे ही लक्षण होते हैं। राजाको उसकी परीक्षा कर लेनी चाहिये। उसके द्वारा दिये गये अन्नको शीघ्रतापूर्वक समीपस्थ अग्निमें डाल देना चाहिये। विषैला अन्न अग्निमें पड़ते ही इन्द्रधनुष-जैसे रंगवाला हो जाता है तथा तुरंत ही सूख जाता है। उसमें स्फोट होने लगता है। वह एक ही ओरसे निकलता है, दुर्गन्धयुक्त होता है और अत्यन्त चटचटाने लगता है। उसके धुँएका सेवन करनेसे जीवके सिरमें रोग उत्पन्न हो जाता है ॥१२-१६॥ |
| सविषेऽन्ने निलीयन्ते न च पार्थिव मक्षिकाः।<br>निलीनाश्च विपद्यन्ते संस्पृष्टे सविषे तथा॥ १७<br>विरज्यति चकोरस्य दृष्टिः पार्थिवसत्तम।<br>विकृतिं च स्वरो याति कोकिलस्य तथा नृप॥ १८<br>गतिः स्खलति हंसस्य भृङ्गराजश्च कूजति।<br>क्रौञ्चो मदमथाभ्येति कृकवाकुर्विरौति च॥ १९<br>विक्रोशति शुको राजन् सारिका वमते ततः।<br>चामीकरोऽन्यतो याति मृत्युं कारण्डवस्तथा॥ २०<br>मेहते वानरो राजन् ग्लायते जीवजीवकः।<br>हृष्टरोमा भवेद् बभ्रुः पृषतश्चैव रोदिति॥ २१<br>हर्षमायाति च शिखी विषसंदर्शनान्नृप।<br>अन्नं च सविषं राजंश्चिरेण च विपद्यते॥ २२<br>तदा भवति निःश्राव्यं पक्षपर्युषितोपमम्।<br>व्यापन्नरसगन्धं च चन्द्रिकाभिस्तथा युतम्॥ २३<br>व्यञ्जनानां तु शुष्कत्वं द्रवाणां बुद्बुदोद्भवः।<br>ससैन्धवानां द्रव्याणां जायते फेनमालिता॥ २४<br>शस्यराजिश्च ताम्रा स्यान्नीला च पयसस्तथा।<br>कोकिलाभा च मद्यस्य तोयस्य च नृपोत्तम॥ २५<br>धान्याम्लस्य तथा कृष्णा कपिला कोद्रवस्य च।<br>मधुश्यामा च तक्रस्य नीला पीता तथैव च॥ २६ | राजन्! विषयुक्त अन्नके ऊपर मक्खियाँ नहीं बैठतीं, यदि बैठ गयीं तो विषसंयुक्त अन्नका स्पर्श होनेके कारण तुरंत ही मर जाती हैं। पार्थिवश्रेष्ठ! विषयुक्त अन्नको देखते ही चकोरकी दृष्टि विरक्त हो जाती है अर्थात् वह अपनी आँखें फेर लेता है, कोकिलका स्वर विकृत हो जाता है, हंसकी गति लड़खड़ाने लगती है, भौंर जोरसे गूँजने लगते हैं, क्रौंच (कुरर) मदमत्त हो जाता है और मुर्गा जोर-जोरसे बोलने लगता है। राजन्! शुक चें-चें करने लगता है, सारिका वमन करने लगती है, चामीकर भाग खड़ा होता है और कारण्डव मर जाता है। राजन्! वानर मूत्र-त्याग करने लगता है, जीवजीवक ग्लानियुक्त हो जाता है, नेवलेके रोएँ खड़े हो जाते हैं, पृषत् मृग रोने लगता है। राजन्! विषको देखते ही मयूर हर्षित हो जाता है; क्योंकि वह चिरकालसे विषयुक्त अन्नका भोजन करनेवाला है। राजन्! वह विषयुक्त अन्न कहने योग्य नहीं रह जाता, पंद्रह दिनके बासी अन्नकी तरह दीख पड़ता है। उसका रस तथा गन्ध नष्ट हो जाती है तथा ऊपरसे वह चन्द्रिकाओंसे युक्त रहता है। नृपोत्तम! विषके मिलनेसे बना हुआ व्यञ्जन सूख जाता है, द्रव वस्तुओंमें बुल्ले उठने लगते हैं, लवणसहित पदार्थोंमें फेन उठने लगते हैं। अन्नोंसे बना हुआ विषैला भोजन ताम्रवर्णका, दूधवाला नीले रंगका, मदिरा तथा जलयुक्त कोकिलके समान काला, अम्ल अन्नवाला काला, कोदोका कपिल तथा मट्ठायुक्त भोजन मधुके समान श्यामल, नीला और पीला हो जाता है॥ १७-२६॥ |
| घृतस्योदकसंकाशा कपोताभा च मस्तुनः।<br>हरिता माक्षिकस्यापि तैलस्य च तथारुणा॥ २७ | विषयुक्तघृतका वर्ण जलकी भाँति, विषमिश्रित छछका कबूतरकी तरह, मधुयुक्तका हरा और तेलमिश्रित विषका |