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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 883 of 1098

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Page 883
  • अध्याय २१८ * | ८७३
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विषणं धारणं कार्यं प्रयत्नेन महीभुजा।<br>विचित्राश्चागदा धार्या विषस्य शमनास्तथा॥ ८४<br>रक्षोभूतपिशाचघ्नाः पापघ्नाः पुष्टिवर्धनाः।<br>कलाविदश्च पुरुषाः पुरे धार्याः प्रयत्नतः॥ ८५<br>भीतान् प्रमत्तान् कुपितांस्तथैव च विमानितान्।<br>कुभृत्यान् पापशीलांश्च न राजा वासयेत् पुरे॥ ८६<br>यन्त्रायुधाट्टालचयोपपन्नं<br>समग्रधान्यौषधिसम्प्रयुक्तम् ।<br>वणिग्जनैश्चावृतमावसेत<br>दुर्गं सुपुष्टं नृपतिः सदैव॥ ८७राजाको प्रयत्नपूर्वक सभी विषोंका संग्रह करना चाहिये तथा विष-प्रभावको शान्त करनेवाली विचित्र ओषधियोंको भी धारण करना उचित है। राक्षस, भूत तथा पिशाचोंके प्रभावको नष्ट करनेवाले, पापनाशक, पुष्टिकारक पदार्थों तथा कलाविज्ञ पुरुषोंको भी दुर्गमें प्रयत्नपूर्वक स्थापित करना चाहिये। राजाको चाहिये कि उस दुर्गमें डरकर भागे हुए, उन्मत्त, क्रुद्ध, अपमानित तथा पापी दुष्ट अनुचरोंको न ठहरने दे। सभी प्रकारके यन्त्र, अस्त्र तथा अट्टालिकाओंके समूहसे संयुक्त, सभी प्रकारके अन्न तथा ओषधियोंसे सुसम्पन्न और व्यवसायी जनोंसे परिपूर्ण दुर्गमें राजाको सदैव सुखपूर्वक निवास करना चाहिये॥ ७५—८७॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे राजधर्मे दुर्गनिर्माणौषध्यादिसंचयकथनं नाम सप्तदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २१७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें राजाओंके लिये दुर्गनिर्माण और ओषधि आदिके संचयका वर्णन नामक दो सौ सतरहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २१७॥


दो सौ अठारहवाँ अध्याय

दुर्गमें संग्राह्य ओषधियोंका वर्णन

मनुरुवाच<br>रक्षोघ्नानि विषघ्नानि यानि धार्याणि भूभुजा।<br>अगदानि समाचक्ष्व तानि धर्मभृतां वर॥ १<br><br>मत्स्य उवाच<br>बिल्वाटकी यवक्षारं पाटला बाहिकोष्णा।<br>श्रीपर्णी शल्लकीयूक्तो निष्क्वाथः प्रोक्षणं परम्॥ २<br>सविषं प्रोक्षितं तेन सद्यो भवति निर्विषम्।<br>यवसैन्धवपानीयवस्त्रशय्यासनोदकम् ॥ ३<br>कवचाभरणं छत्रं वालव्यजनवेश्मनाम्।<br>शेलुः पाटलातिविषा शिग्रु मूर्वा पुनर्नवा॥ ४<br>समङ्गा वृषमूलं च कपित्थवृषशोषितम्।<br>महादन्तशठं तद्वत् प्रोक्षणं विषनाशनम्॥ ५<br>लाक्षाप्रियङ्गुमञ्जिष्ठा सममेला हरेणुका।<br>यष्ट्याह्वा मधुरा चैव बभ्रुपित्तेन कल्पिताः॥ ६<br>निखनेद् गोविषाणस्थं समरात्रं महीतले।<br>ततः कृत्वा मणिं हेम्ना बद्धं हस्तेन धारयेत्॥ ७मनुने पूछा— धार्मिकश्रेष्ठ! राजाको राक्षस, विष और रोगको दूरकर स्वस्थ करनेवाली जिन ओषधियोंका दुर्गमें संग्रह करना चाहिये, उनका वर्णन कीजिये॥ १॥<br><br>मत्स्यभगवान्ने कहा— बिल्वाटकी, जवाखार, पाटला, बाहिक, ऊषणा, श्रीपर्णी और शल्लकी—इन ओषधियोंका काढ़ा उत्तम प्रोक्षण है। विषग्रस्त प्राणीद्वारा उसका सेवन करनेसे वह तुरंत ही विषरहित हो जाता है। उसी प्रकार इनके द्वारा सेवन करनेसे यव, सैन्धव, पानीय, वस्त्र, शय्या, आसन, जल, कवच, आभरण, छत्र, चामर और गृह आदि विषरहित हो जाते हैं। शेलु, पाटली, अतिविषा, शिग्रु, मूर्वा, पुनर्नवा, समंगा, वृषमूल, कपित्थ, वृषशोषित तथा महादन्तशठ—इन ओषधियोंके काढ़ेका सेवन भी उसी प्रकार विषनाशक होता है। लाह, प्रियंगु, मंजीठ, समान भागमें इलायची, हर्रे, जेठीमधु और मधुरा—इन्हें नकुल-पित्तसे संयुक्त करके गायके सींगमें रखकर सात राततक पृथ्वीमें गाड़ दे। इसके बाद उसे सुवर्णजटित मणिकी अंगूठीमें रखकर हाथमें धारण कर