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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 880 of 1098

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Page 880
८७०* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
यवसानां प्रभूतानामिन्धनस्य च संचयः।<br>गुडस्य सर्वतैलानां गोरसानां तथैव च॥ ३५<br>वसानामथ मज्जानां स्नायूनामस्थिभिः सह।<br>गोचर्मपटहानां च धान्यानां सर्वतस्तथा॥ ३६<br>तथैवाभ्रपटानां च यवगोधूमयोरपि।<br>रत्नानां सर्ववस्त्राणां लोहानामप्यशेषतः॥ ३७<br>कलायमुद्गमाषाणां चणकानां तिलैः सह।<br>तथा च सर्वसस्यानां पांसुगोमययोरपि॥ ३८<br>शणसर्ज्रसं भूर्ज जतु लाक्षा च टङ्कणम्।<br>राजा संचिनुयाद् दुर्गे यच्चान्यदपि किञ्चन॥ ३९<br>कुम्भाश्चाशीविषैः कार्या व्यालसिंहादयस्तथा।<br>मृगाश्च पक्षिणश्चैव रक्ष्यास्ते च परस्परम्॥ ४०<br>स्थानानि च विरुद्धानां सुगुप्तानि पृथक् पृथक्।<br>कर्तव्यानि महाभाग यत्नेन पृथिवीक्षिता॥ ४१<br>उक्तानि चाप्यनुक्तानि राजद्रव्याण्यशेषतः।<br>सुगुप्तानि पुरे कुर्याज्जनानां हितकाम्यया॥ ४२वहाँ प्रचुरमात्रामें घास-भूसा, ईंधन, गुड, सभी प्रकारके तेल तथा गोरसका भी संचय हो। राजाको दुर्गमें वसा, मज्जा, हड्डियोंसहित स्नायु, गोचर्मसे बने नगाड़े, धान्य, तम्बू, जौ, गेहूँ, रत्न, सभी प्रकारके वस्त्र, लौह, कुलथी, मूँग, उड़द, चना, तिल, सभी प्रकारके अन्न, धूल, गोबर, सन, भोजपत्र, जस्ता, लाह, पत्थर तोड़नेकी छेनी तथा अन्य भी जो कुछ पदार्थ हों, उनका संचय करना चाहिये। सर्पोंके विषसे भरे घड़े, साँप, सिंह आदि हिंसक जन्तु, मृग तथा पक्षी रखे जाने चाहिये, किंतु वे एक-दूसरेसे सुरक्षित रहें। महाभाग! राजाको विरोधी जीवोंकी रक्षाके लिये यत्नपूर्वक पृथक्-पृथक् स्थान बनवाना चाहिये। राजाको प्रजाकी कल्याण-भावनासे कही गयी अथवा न कही गयी सम्पूर्ण राजवस्तुओंको दुर्गमें गुप्तरूपसे संग्रहीत करना चाहिये॥२७—४२॥
जीवकर्षभकाकोलमामलक्याटरूषकम् ।<br>शालपर्णी पृश्निपर्णी मुद्गपर्णी तथैव च॥ ४३<br>माषपर्णी च मेदे द्वे शारिवे द्वे बलात्रयम्।<br>वीरा श्वसन्ती वृष्या च बृहती कण्टकारिका॥ ४४<br>शृङ्गी शृङ्गाटकी द्रोणी वर्षाभूर्दर्भ रेणुका।<br>मधुपर्णी विदार्यौ द्वे महाक्षीरा महातपाः॥ ४५<br>धन्वनः सहदेवाह्वा कटुकैरण्डकं विषः।<br>पर्णी शताह्वा मृद्वीका फल्गुखर्जूरयष्टिकाः॥ ४६<br>शुक्रातिशुक्रकाश्मर्यश्छत्रातिच्छत्रवीरणाः ।<br>इक्षुरिक्षुविकाराश्च फाणिताद्याश्च सत्तम॥ ४७<br>सिंही च सहदेवी च विश्वेदेवाश्वरोधकम्।<br>मधुकं पुष्पहंसाख्या शतपुष्पा मधूलिका॥ ४८<br>शतावरीमधूके च पिप्पलं तालमेव च।<br>आत्मगुप्ता कट्फलाख्या दार्विका राजशीर्षकी॥ ४९<br>राजसर्षपधान्याकमृष्यप्रोक्ता तथोत्कटा।<br>कालशाकं पद्मबीजं गोवल्ली मधुवल्लिका॥ ५०<br>शीतपाकी कुलिङ्गाक्षी काकजिह्वोरुपुष्पिका।<br>पर्वतत्रपुसौ चोभौ गुञ्जातकपुनर्नवे॥ ५१जीवक, ऋषभक, काकोल, इमली, आटरूष, शालपर्णी, पृश्निपर्णी, मुद्गपर्णी, माषपर्णी, दोनों प्रकारकी मेदा, दोनों प्रकारकी शारिवा, तीनों बलाएँ (एक ओषधि), वीरा, श्वसन्ती, वृष्या, बृहती, कण्टकारिका, शृङ्गी, शृङ्गाटकी, द्रोणी, वर्षाभू, कुश, रेणुका, मधुपर्णी, दोनों विदारी, महाक्षीरा, महातपा, धन्वन, सहदेवी, कटुक, रेड़, विष, शतपर्णी, मृद्वीका, फल्गु, खजूर, यष्टिका, शुक्र, अतिशुक्र, काश्मरी, छत्र, अतिच्छत्र, वीरण, ईख और ईखसे होनेवाली अन्य वस्तुएँ, फाणित आदि, सिंही, सहदेवी, विश्वदेव, अश्वरोधक, महुआ, पुष्पहंसा, शतपुष्पा, मधूलिका, शतावरी, महुआ, (दाख) पिप्पल, ताल, आत्मगुप्ता, कटफल, दार्विका, राजशीर्षकी, श्वेत सरसों, धनिया, ऋष्यप्रोक्ता, उत्कटा, कालशाक, पद्मबीज, गोवल्ली, मधुवल्लिका, शीतपाकी, कुलिंगाक्षी, काकजिह्वा, उरुपुष्पका, दोनों पर्वत और त्रपुष, गुंजातक, पुनर्नवा,