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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 86 of 1098

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Page 86
७६* मत्स्यपुराण *

| यावदब्दं तु यो दद्यादुदकुम्भं विमत्सरः।<br>प्रेतायान्नसमायुक्तं सोऽश्वमेधफलं लभेत्॥ २६<br><br>आमश्राद्धं यदा कुर्याद् विधिज्ञः श्राद्धदस्तदा।<br>तेनाग्नौकरणं कुर्यात् पिण्डांस्तेनैव निर्वपेत्॥ २७<br><br>त्रिभिः सपिण्डीकरणे अशेषत्रितये पिता।<br>यदा प्राप्स्यति कालेन तदा मुच्येत बन्धनात्॥ २८<br><br>मुक्तोऽपि लेपभागित्वं प्राप्नोति कुशमार्जनात्।<br><br>लेपभाजश्चतुर्थाद्याः पित्राद्याः पिण्डभागिनः।<br>पिण्डदः सप्तमस्तेषां सापिण्ड्यं साप्तपौरुषम्॥ २९ | जो मनुष्य मत्सररहित होकर वर्षपर्यन्त प्रेतके निमित्त अन्न आदि पदार्थोंसे युक्त जलपात्र दान करता रहता है, उसे अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त होता है। विधियोंका ज्ञाता श्राद्धकर्ता जब आमश्राद्ध (जिसमें ब्राह्मणोंको भोजन न कराकर कच्चा अन्न दिया जाता है) करे तो विधिपूर्वक अग्निकरण करे और उसी समय पिण्डदान भी करे। जब पिता सपिण्डीकरण श्राद्धमें अपने पिता, पितामह, प्रपितामहके साथ सम्बन्ध प्राप्त कर लेता है, तब वह बन्धनसे मुक्त हो जाता है। मुक्त होनेपर भी वह कुशके मार्जनसे लेपभागी हो जाता है। इस प्रकार चतुर्थ और पञ्चमसहित तीन पितर लेपभागी और पिता आदि तीन पिण्डभागी हैं। उनमें पिण्डदाता सातवीं संतान है। इस प्रकार सात पीढ़ीतक सपिण्डता मानी जाती है॥ २७—२९॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सपिण्डीकरणकल्पो नामाष्टादशोऽध्यायः॥ १८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें सपिण्डीकरण नामक अठारहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १८॥


उन्नीसवाँ अध्याय

श्राद्धोंमें पितरोंके लिये प्रदान किये गये हव्य-कव्यकी प्राप्तिका विवरण

| ऋषय ऊचुः<br><br>कथं कव्यानि देयानि हव्यानि च जनैरिह।<br>गच्छन्ति पितृलोकस्थान् प्रापकः कोऽत्र गद्यते॥ १<br><br>यदि मर्त्यो द्विजो भुङ्क्ते हूयते यदि वानले।<br>शुभाशुभात्मकैः प्रेतैर्दत्तं तद् भुज्यते कथम्॥ २ | ऋषियोंने पूछा— सूतजी! मनुष्योंको (पितरोंके निमित्त) हव्य और कव्य किस प्रकार देना चाहिये? इस मृत्युलोकमें पितरोंके लिये प्रदान किये गये हव्य-कव्य पितृलोकमें स्थित पितरोंके पास कैसे पहुँच जाते हैं? यहाँ उनको पहुँचानेवाला कौन कहा गया है? यदि मृत्युलोकवासी ब्राह्मण उन्हें खा जाता है अथवा अग्निमें उनकी आहुति दे दी जाती है तो अपने कर्मानुसार शुभ एवं अशुभ योनियोंमें गये हुए प्रेतोंद्वारा उस पदार्थका उपभोग कैसे किया जाता है?॥ १-२॥ |