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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 847 of 1098

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Page 847

* अध्याय २०६ * | ८३७


दो सौ छठा अध्याय

कृष्णमृगचर्मके दानकी विधि और उसका माहात्म्य

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मनुरुवाच<br>कृष्णाजिनप्रदानस्य विधिकारलौ ममानघ।<br>ब्राह्मणं च तथाऽऽचक्ष्व तत्र मे संशयो महान्॥ १**मनुजीने पूछा—**निष्पाप परमात्मन्! कृष्ण मृगचर्म प्रदान करनेकी विधि, उसका समय तथा कैसे ब्राह्मणको दान देना चाहिये—इसका विधान मुझे बताइये। इस विषयमें मुझे महान् संदेह है॥ १॥
मत्स्य उवाच<br>वैशाखी पौर्णमासी च ग्रहणे शशिसूर्ययोः।<br>पौर्णमासी तु या माघी ह्याषाढी कार्तिकी तथा॥ २<br>उत्तरायणे च द्वादश्यां तस्यां दत्तं महाफलम्।<br>आहिताग्निर्द्विजो यस्तु तद् देयं तस्य पार्थिव॥ ३<br>यथा येन विधानेन तन्मे निगदतः शृणु।<br>गोमयेनोपलिप्ते तु शुचौ देशे नराधिप॥ ४<br>आदावेव समास्तीर्य शोभनं वस्त्रमाविकम्।<br>ततः सशृङ्गं सखुरमास्तरेत् कृष्णमार्गकम्॥ ५<br>कर्तव्यं रुक्मशृङ्गं तद् रौप्यदन्तं तथैव च।<br>लाङ्गूलं मौक्तिकैर्युक्तं तिलच्छन्नं तथैव च॥ ६<br>तिलैः सुपूरितं कृत्वा वाससाऽऽच्छादयेद् बुधः।<br>सुवर्णनाभं तत् कुर्यादलंकुर्याद् विशेषतः॥ ७<br>रत्नैर्गन्धैर्यथाशक्त्या तस्य दिक्षु च विन्यसेत्।<br>कांस्यपात्राणि चत्वारि तेषु दद्याद् यथाक्रमम्॥ ८<br>मृण्मयेषु च पात्रेषु पूर्वादिषु यथाक्रमम्।<br>घृतं क्षीरं दधि क्षौद्रमेवं दद्याद् यथाविधि॥ ९<br>चम्पकस्य तथा शाखामभ्रणं कुम्भमेव च।<br>बाह्योपस्थानकं कृत्वा शुभचित्तो निवेशयेत्॥ १०**मत्स्यभगवान् बोले—**राजन्! वैशाखकी पूर्णिमाको, चन्द्रमा एवं सूर्यके ग्रहणके अवसरपर, माघ, आषाढ़ तथा कार्तिककी पूर्णिमा तिथिमें, सूर्यके उत्तरायण रहनेपर तथा द्वादशी तिथिमें (कृष्णमृगचर्मके) दानका महाफल कहा गया है। जो ब्राह्मण नित्य अग्न्याधान करनेवाला हो उसीको वह दान देना चाहिये। अब जिस प्रकार और जिस विधानसे वह दान देना चाहिये, उसे मैं बतला रहा हूँ, सुनिये। नरेश्वर! पवित्र स्थानपर गोबरसे लिपी हुई पृथ्वीपर सर्वप्रथम सुन्दर ऊनी वस्त्र बिछाकर फिर खुर और सींगोंसे युक्त उस कृष्णमृगचर्मको बिछा दे। उस मृगचर्मके सींगोंको सुवर्णसे, दाँतोंको चाँदीसे, पूँछको मोतियोंसे अलंकृत कर उसे तिलोंसे आवृत कर दे। बुद्धिमान् पुरुष उस मृगचर्मको तिलोंसे पूरित कर वस्त्रसे ढक दे। उसकी सुवर्णमय नाभि बनाकर उसे अपनी शक्तिके अनुकूल रत्नों तथा सुगन्धित पदार्थोंसे विशेषरूपसे अलंकृत कर दे। फिर क्रमानुसार काँसेके बने हुए चार पात्रोंको उसकी चारों दिशाओंमें रखे। फिर पूर्व आदि दिशाओंमें क्रमशः चार मिट्टीके पात्रोंमें घृत, दुग्ध, दही तथा मधु विधिवत् भर दे। तदुपरान्त चम्पककी एक डाल तथा छिद्ररहित एक कलश बाहर पूर्वकी ओर मङ्गलमय भावनासे स्थापित करे॥ २—१०॥
सूक्ष्मवस्त्रं शुभं पीतं मार्जनार्थं प्रयोजयेत्।<br>तथा धातुमयं पात्रं पादयोस्तस्य दापयेत्॥ ११<br>यानि कानि च पापानि मया लोभात् कृतानि वै।<br>लौहपात्रादिदानेन प्रणश्यन्तु ममाशु वै॥ १२मार्जनके लिये एक सुन्दर महीन पीले वस्त्रका प्रयोग करे तथा धातु-निर्मित पात्र उसके दोनों पैरोंके पास रख दे। तत्पश्चात् ऐसा कहे कि 'मैंने लोभमें पड़कर जिन-जिन पापोंको किया है, वे लौहमय पात्रादिका दान करनेसे शीघ्र ही नष्ट हो जायें।'
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