मत्स्य महापुराण

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८३० | * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एवमुक्तस्तदा तेन निमिना ब्राह्मणोत्तमः ॥ १३<br>शशाप तं निमिं क्रोधाद् विदेहस्त्वं भविष्यसि।<br>श्रान्तं मां त्वं समुत्सृज्य यस्मादन्यं द्विजोत्तमम्॥ १४<br>धर्मज्ञस्तु नरेन्द्र त्वं याजकं कर्तुमिच्छसि।<br>निमिस्तं प्रत्युवाचाथ धर्मकार्यरत्तस्य मे॥ १५<br>विघ्नं करोषि नान्येन याजनं च तथेच्छसि।<br>शापं ददामि तस्मात् त्वं विदेहोऽथ भविष्यसि॥ १६<br>एवमुक्ते तु तौ जातौ विदेहौ द्विजपार्थिवौ।<br>देहहीनौ तयोर्जीवौ ब्रह्माणमुपजग्मतुः ॥ १७<br>तावागतौ समीक्ष्याथ ब्रह्मा वचनमब्रवीत्।<br>अद्यप्रभृति ते स्थानं निमिजीव ददाम्यहम् ॥ १८<br>नेत्रपक्ष्मसु सर्वेषां त्वं वसिष्यसि पार्थिव।<br>त्वत्सम्बन्धात् तथा तेषां निमेषः सम्भविष्यति ॥ १९<br>चालयिष्यन्ति तु तदा नेत्रपक्ष्माणि मानवाः।<br>एवमुक्तो मनुष्याणां नेत्रपक्ष्मसु सर्वशः॥ २०<br>जगाम निमिजीवस्तु वरदानात् स्वयम्भुवः।<br>वसिष्ठजीवो भगवान् ब्रह्मा वचनमब्रवीत् ॥ २१<br>मित्रावरुणयोः पुत्रो वसिष्ठ त्वं भविष्यसि।<br>वसिष्ठेति च ते नाम तत्रापि च भविष्यति॥ २२<br>जन्मद्वयमतीतं च तत्रापि त्वं स्मरिष्यसि।<br>एतस्मिन्नेव काले तु मित्रश्च वरुणस्तथा॥ २३<br>बदर्याश्रममासाद्य तपस्तेपतुरव्ययम्।<br>तपस्यतोस्तयोरेवं कदाचिन्माधवे ऋतौ॥ २४<br>पुष्पितद्रुमसंस्थाने शुभे दयितमारुते।<br>उर्वशी तु वरारोहा कुर्वती कुसुमोच्चयम् ॥ २५<br>सुसूक्ष्मरक्तवसना तयोर्दृष्टिपथं गता।<br>तां दृष्ट्वेन्दुमुखीं सुभ्रूं नीलनीरजलोचनाम् ॥ २६<br>उभौ चुक्षुभतुर्देवौ तद्रूपपरिमोहितौ।<br>तपस्यतोस्तयोर्वीर्यमस्खलच्च मृगासने ॥ २७<br>स्कन्नं रेतस्ततो दृष्ट्वा शापभीता वराप्सरा।<br>चकार कलशे शुक्लं तोयपूर्णे मनोरमे॥ २८<br>तस्मादृषिवरौ जातौ तेजसाप्रतिमौ भुवि।<br>वसिष्ठश्चाप्यगस्त्यश्च मित्रावरुणयोः सुतौ॥ २९ | तब उन निमिद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर ब्राह्मणश्रेष्ठ वसिष्ठने क्रोधपूर्वक निमिको शाप देते हुए कहा—'नरेन्द्र! यदि तुम धर्मके ज्ञाता होकर भी मुझ थके हुए पुरोहितका परित्याग कर किसी अन्य ब्राह्मणश्रेष्ठको याजक बनाना चाहते हो तो तुम शरीररहित हो जाओगे।' तब निमिने उत्तर दिया—'मैं धार्मिक कार्यके लिये उद्यत हूँ, किंतु आप इसमें विघ्न डाल रहे हैं तथा दूसरेके द्वारा यज्ञ सम्पन्न होने देना भी नहीं चाहते, अतः मैं भी आपको शाप दे रहा हूँ कि आप भी विदेह हो जायेंगे।' ऐसा कहते ही वे दोनों ब्राह्मण और राजा शरीररहित हो गये। तब उन दोनोंके देहहीन जीव ब्रह्माके पास गये। उन दोनोंको आया हुआ देखकर ब्रह्मा इस प्रकार बोले—'निमिरूप जीव! आजसे मैं तुम्हारे लिये एक स्थान दे रहा हूँ। राजन्! तुम सभी प्राणियोंके नेत्रोंके पलकोंमें निवास करोगे। तुम्हारे संयोगसे ही उनके निमेष-उन्मेष (आँखका खुलना और बंद होना) होंगे। तब सभी मानव नेत्रोंके पलकोंको चलाते रहेंगे।' इस प्रकार कहे जानेपर निमिका जीव ब्रह्माके वरदानसे सभी मनुष्योंके नेत्र-पलकोंपर स्थित हो गया॥ १३–२० १/२ ॥<br><br>तदनन्तर भगवान् ब्रह्माने वसिष्ठके जीवसे कहा—'वसिष्ठ! तुम मित्रावरुणके पुत्र होओगे। वहाँ भी तुम्हारा नाम वसिष्ठ ही होगा और तुम्हें बीते हुए दो जन्मोंका स्मरण बना रहेगा। इसी समय मित्र और वरुण—दोनों बदरिकाश्रममें आकर दुष्कर तपस्यामें तत्पर थे। इस प्रकार उन दोनोंके तपस्यामें रत रहनेपर किसी समय वसन्त-ऋतुमें जब सभी वृक्ष और लताएँ पुष्पित थीं, मन्द-मन्द मनोहर पवन प्रवाहित हो रहा था, सुन्दरी उर्वशी पुष्पोंको चुनती हुई वहाँ आयी। वह महीन लाल वस्त्र धारण किये हुए थी। संयोगवश वह उन दोनों तपस्वियोंकी आँखोंके सामने आ गयी। उसके नेत्र नील कमलके समान थे तथा मुख चन्द्रमाके समान सुन्दर था। उस सुन्दर भौंहोंवाली उर्वशीको देखकर उसके रूपपर मोहित हो उन दोनों तपस्वियोंका मन क्षुब्ध हो उठा। तब तपस्या करते हुए ही उन दोनोंका वीर्य मृगासनपर स्खलित हो गया। तब शापसे भयभीत हुई सुन्दरी उर्वशीने उस वीर्यको जलपूर्ण मनोरम कलशमें रख दिया। उस कलशसे वसिष्ठ और अगस्त्य नामक दो ऋषिश्रेष्ठ उत्पन्न हुए, जो भूतलपर अनुपम तेजस्वी थे। वे मित्र और वरुणके पुत्र कहलाये। तदनन्तर वसिष्ठने |