मत्स्य महापुराण

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| ७७४ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| अविमुक्तगुणानां तु कः समर्थो वदिष्यति।<br>देवब्राह्मणविद्विष्टा देवभक्तिविडम्बकाः ॥ ४५<br>ब्रह्मघ्नाश्च कृतघ्नाश्च तथा निष्कृतिकाश्च ये।<br>लोकद्विषो गुरुद्विषस्तीर्थायतनदूषकाः ॥ ४६<br>सदा पापरताश्चैव ये चान्ये कुत्सिता भुवि।<br>तेषां नास्तीति वासो वै स्थितोऽसौ दण्डनायकः॥ ४७<br>रक्षणार्थं नियुक्तं वै दण्डनायकमूत्तमम्।<br>पूजयित्वा यथाशक्त्या गन्धपुष्पादिधूपकैः ॥ ४८<br>नमस्कारं ततः कृत्वा नायकस्य तु मन्त्रवित्।<br>सर्ववर्णावृते क्षेत्रे नानाविधसरीसृपे ॥ ४९<br>ईश्वरानुगृहीता हि गतिं गाणेश्वरीं गताः।<br>नानारूपधरा दिव्या नानावेशधरास्तथा ॥ ५०<br>सुरा वै ये तु सर्वे च तन्निष्ठास्तत्परायणाः।<br>यदिच्छन्ति परं स्थानमक्षयं तदवाप्नुयुः ॥ ५१<br>परं पुरं दैवपुराद् विशिष्यते<br>तदुत्तरं ब्रह्मपुरात् पुरः स्थितम्।<br>तपोबलादीश्वरयोगनिर्मितं<br>न तत्समं ब्रह्मदिवौकसालयम्।<br>मनोरमं कामगमं ह्यनामय-<br>मतीत्य तेजांसि तपांसि योगवत् ॥ ५२<br>अधिष्ठितस्तु तत्स्थाने देवदेवो विराजते।<br>तपांसि यानि तप्यन्ते व्रतानि नियमाश्च ये॥ ५३<br>सर्वतीर्थाभिषेकं तु सर्वदानफलानि च।<br>सर्वयज्ञेषु यत् पुण्यमविमुक्ते तदाप्नुयात् ॥ ५४<br>अतीतं वर्तमानं च यज्ज्ञानाज्ञानतोऽपि वा।<br>सर्वं तस्य च यत्पापं क्षेत्रं दृष्ट्वा विनश्यति ॥ ५५ | अविमुक्तक्षेत्रके सभी गुणोंका वर्णन करनेमें कौन समर्थ हो सकता है ? देवता और ब्राह्मणसे विद्वेष करनेवाले, देवभक्तिकी विडम्बना करनेवाले, ब्राह्मणोंकी हत्या करनेवाले, किये हुए उपकारको न माननेवाले, निष्कृष्ट-अकर्मण्य, लोकद्वेषी, गुरुद्वेषी, तीर्थस्थानोंको दूषित करनेवाले, सदा पापमें रत तथा इनके अतिरिक्त जो निषिद्ध कर्मोंके आचरण करनेवाले हैं—उन सबके लिये यहाँ स्थान नहीं है; क्योंकि यहाँ दण्डनायक अवस्थित हैं। यहाँ श्रेष्ठ दण्डनायकको इसकी रक्षाके लिये नियुक्त किया गया है। सभी वर्णाश्रमियों तथा अनेक प्रकारके जन्तुओंसे भरे हुए इस क्षेत्रमें नायकके परामर्शसे यथाशक्ति गन्ध, पुष्प, धूप आदिसे पूजन करनेके पश्चात् उन्हें नमस्कार करके ईश्वरके अनुग्रहसे बहुत-से लोग गणेश्वरकी गतिको प्राप्त हो गये हैं। अनेकों वेष और विभिन्न रूप धारण करनेवाले सभी दिव्य देव, शिवमें श्रद्धासम्पन्न एवं शिवभक्ति-परायण हो जिस अक्षय श्रेष्ठ स्थानकी कामना करते हैं, वह उन्हें प्राप्त हो जाता है। यह श्रेष्ठ नगर अमरावतीसे भी विशिष्ट है। इस अविमुक्तनगरका उत्तरी भाग ब्रह्मलोकसे भी अधिक प्रतिष्ठित है। यह शिवजीके तपोबल और उनकी योगमहिमासे निर्मित है, अतः इसके समान ब्रह्मलोक तथा स्वर्ग भी नहीं है। यह मनोरम, अभिलाषाको पूर्ण करनेवाला, रोगरहित, तेज और तपस्यासे परे तथा योगयुक्त है। इस अविमुक्तक्षेत्रमें देवाधिदेव शंकर सदा विराजमान रहते हैं। जो लोग सभी प्रकारके तप, व्रत, नियम, सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान, सभी प्रकारके दान और सभी प्रकारके यज्ञानुष्ठानसे जो पुण्य प्राप्त करते हैं, वह अविमुक्तनगरमें प्राप्त हो जाता है। अतीत या वर्तमानमें ज्ञानसे या अज्ञानसे किये गये उनके सभी पाप क्षेत्रके दर्शनमात्रसे विनष्ट हो जाते हैं॥ ४५—५५॥ |
| शान्तैर्दान्तैस्तपस्तप्तं यत्किञ्चिद् धर्मसंज्ञितम्।<br>सर्वं च तदवाप्नोति अविमुक्ते जितेन्द्रियः ॥ ५६<br><br>अविमुक्तं समासाद्य लिङ्गमर्चयते नरः।<br>कल्पकोटिशतैश्चापि नास्ति तस्य पुनर्भवः ॥ ५७<br><br>अमरा ह्यक्षयाश्चैव क्रीडन्ति भवसंनिधौ।<br>क्षेत्रतीर्थोपनिषदमविमुक्तं न संशयः ॥ ५८<br><br>अविमुक्ते महादेवमर्चयन्ति स्तुवन्ति वै।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तास्ते तिष्ठन्त्यजरामराः ॥ ५९ | अपनी इन्द्रियोंको वशमें रखकर शान्तचित्तसे की गयी तपस्यासे एवं विहित कर्मोंके आचरणसे जो फल मिलते हैं, वह सब अविमुक्तनगरमें जितेन्द्रियको प्राप्त हो जाता है। जो मनुष्य अविमुक्तनगरमें आकर शिवलिङ्गकी पूजा करता है, उसका सैकड़ों करोड़ कल्पोंमें भी पुनर्जन्म नहीं होता। ऐसे लोग अमर और अविनश्वर रूपमें शिवके समीप क्रीड़ा करते हैं। यह अविमुक्तनगर अन्य स्थानों और तीर्थोंका प्रकाश-संवित्स्वरूप है—इसमें संदेह नहीं है। जो अविमुक्तनगरमें महादेवकी पूजा और स्तुति करते हैं, वे सभी पापोंसे विनिर्मुक्त होकर अजर-अमर हो जाते |