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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 747 of 1098

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Page 747
  • अध्याय १७८ * | ७३७
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| स्वां दिशं भजतां शक्रो दिशं वरुण एव च।<br>याम्यां यमः पालयतामुत्तरां च धनाधिपः॥ ६८<br>ऋक्षैः सह यथायोगं गच्छतां चैव चन्द्रमाः।<br>अब्दमृतुमुखे सूर्यो भजतामयनैः सह॥ ६९<br>आज्यभागाः प्रवर्त्तन्तां सदस्यैरभिपूजिताः।<br>हूयन्तामग्नयो विप्रैर्वेददृष्टेन कर्मणा॥ ७०<br>देवाश्चाप्यग्निहोमेन स्वाध्यायेन महर्षयः।<br>श्राद्धेन पितरश्चैव तृप्तिं यान्तु यथासुखम्॥ ७१<br>वायुश्चरतु मार्गस्थस्त्रिधा दीप्यतु पावकः।<br>त्रींस्तु वर्णांश्च लोकांस्त्रींस्तर्पयंश्चात्मजैर्गुणैः॥ ७२<br>क्रतवः सम्प्रवर्त्तन्तां दीक्षणीयैर्द्विजातिभिः।<br>दक्षिणाश्चोपपाद्यन्तां याज्ञिकेभ्यः पृथक् पृथक् ॥ ७३<br>गां तु सूर्यो रसान् सोमो वायुः प्राणांश्च प्राणिषु।<br>तर्पयन्तः प्रवर्त्तन्तां सर्व एव स्वकर्मभिः॥ ७४<br>यथावदानुपूर्व्येण महेन्द्रमलयोद्भवाः।<br>त्रैलोक्यमातरः सर्वाः समुद्रं यान्तु सिन्धवः॥ ७५<br>दैत्येभ्यस्त्यज्यतां भीश्च शान्तिं व्रजत देवताः।<br>स्वस्ति वोऽस्तु गमिष्यामि ब्रह्मलोकं सनातनम्॥ ७६<br>स्वगृहे स्वर्गलोके वा संग्रामे वा विशेषतः।<br>विश्रम्भो वो न मन्तव्यो नित्यं क्षुद्रा हि दानवाः॥ ७७<br>छिद्रेषु प्रहरन्त्येते न तेषां संस्थितिर्ध्रुवा।<br>सौम्यानामृजुभावानां भवतामार्जवं धनम्॥ ७८<br>एवमुक्त्वा सुरगणान् विष्णुः सत्यपराक्रमः।<br>जगाम ब्रह्मणा सार्धं स्वलोकं तु महायशाः॥ ७९<br>एतदाश्चर्यमभवत् संग्रामे तारकामये।<br>दानवानां च विष्णोश्च यन्मां त्वं परिपृष्टवान्॥ ८० | अब इन्द्र अपनी पूर्व दिशाकी रक्षा करें तथा वरुण पश्चिम दिशाकी, यम दक्षिण दिशाका और कुबेर उत्तर दिशाका पालन करें। चन्द्रमा नक्षत्रोंके साथ पूर्ववत् अपने स्थानको चले जायँ। सूर्य अयनोंके साथ ऋतुकालानुसार वर्षका उपभोग करें। यज्ञोंमें सदस्योंद्वारा अभिपूजित हो देवगण आज्यभाग ग्रहण करें। ब्राह्मणलोग वेदविहित कर्मानुसार अग्निमें आहुतियाँ डालें। देवगण अग्निहोत्रसे, महर्षिगण स्वाध्यायसे और पितृगण श्राद्धसे सुखपूर्वक तृप्तिलाभ करें। वायु अपने मार्गसे प्रवाहित हों। अग्नि अपने गुणोंसे तीनों वर्णों और तीनों लोकोंको तृप्त करते हुए तीन भागोंमें विभक्त होकर प्रकाशित हों॥ ६५-७२॥<br><br>दीक्षित ब्राह्मणोंद्वारा यज्ञानुष्ठान प्रारम्भ हों। याज्ञिक ब्राह्मणोंको पृथक्-पृथक् दक्षिणाएँ दी जायँ। सूर्य पृथ्वीको, चन्द्रमा रसोंको और वायु प्राणियोंमें स्थित प्राणोंको तृप्त करते हुए सभी अपने-अपने कर्ममें प्रवृत्त हों। महेन्द्र और मलय पर्वतसे निकलनेवाली त्रिलोकीकी मातास्वरूप सभी नदियाँ आनुपूर्वी पूर्ववत् समुद्रमें प्रविष्ट हों। देवगण! आपलोग दैत्योंसे प्राप्त होनेवाले भयको छोड़ दें और शान्ति धारण करें। आपलोगोंका कल्याण हो। अब मैं सनातन ब्रह्मलोकको जा रहा हूँ। आपलोगोंको अपने घरमें अथवा स्वर्गलोकमें अथवा विशेषकर संग्राममें दैत्योंका विश्वास नहीं करना चाहिये; क्योंकि दानव सदा क्षुद्र प्रकृतिवाले होते हैं। वे छिद्र पाकर तुरंत प्रहार कर बैठते हैं। उनकी स्थिति कभी निश्चित नहीं रहती। इधर सौम्य एवं कोमल स्वभाववाले आपलोगोंका आर्जव ही धन है। महायशस्वी एवं सत्यपराक्रमी भगवान् विष्णु देवगणोंसे ऐसा कहकर ब्रह्माके साथ अपने लोकको चले गये। राजन्! दानवों और भगवान् विष्णुके मध्य घटित हुए तारकामय संग्राममें यही आश्चर्य हुआ था, जिसके विषयमें तुमने मुझसे प्रश्न किया था॥ ७३-८०॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे पद्मोद्भवप्रादुर्भावसंग्रहो नामाष्टासप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १७८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें पद्मोद्भवप्रादुर्भावसंग्रह नामक एक सौ अठहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १७८॥

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