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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 744 of 1098

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Page 744

७३४ * मत्स्यपुराण *


संस्कृतहिन्दी
अद्य त्वां नाशयिष्यामि देवव्यापारघातकम्।<br>स्वेषु स्वेषु च स्थानेषु स्थापयिष्यामि देवताः॥ २७कौन कुशलपूर्वक जीवित रह सकता है। अतः देवताओंके कार्योंमें बाधा पहुँचानेवाले तुम्हें मैं आज ही नष्ट कर डालूँगा और देवताओंको पुनः अपने-अपने स्थानोंपर स्थापित कर दूँगा।'॥ २३-२७॥
एवं ब्रुवति वाक्यं तु मृधे श्रीवत्सधारिणि।<br>जहास दानवः क्रोधाद्धस्तांश्चक्रे सहायुधान्॥ २८<br>स बाहुशतमुद्यम्य सर्वास्त्रग्रहणं रणे।<br>क्रोधाद् द्विगुणरक्ताक्षो विष्णुं वक्ष्यस्ताडयत्॥ २९<br>दानवाश्चापि समरे मयतारपुरोगमाः।<br>उद्यतायुधनिस्त्रिंशा विष्णुमभ्यद्रवन् रणे॥ ३०<br>स ताड्यमानोऽतिबलैर्दैत्यैः सर्वोद्यतायुधैः।<br>न चचाल ततो युद्धेऽकम्प्यमान इवाचलः॥ ३१<br>संसक्तश्च सुपर्णेन कालनेमी महासुरः।<br>स्वप्राणेन महतीं गदामुद्यम्य बाहुभिः॥ ३२<br>घोरां ज्वलन्तीं मुमुचे संरब्धो गरुडोपरि।<br>कर्मणा तेन दैत्यस्य विष्णुर्विस्मयमाविशत्॥ ३३<br>यदा तेन सुपर्णस्य पातिता मूर्ध्नि सा गदा।<br>सुपर्णं व्यथितं दृष्ट्वा कृत्तं च वपुरात्मनः॥ ३४<br>क्रोधसंरक्तनयनो वैकुण्ठश्चक्रमाददे।<br>व्यवधंत स वेगेन सुपर्णेन समं विभुः॥ ३५<br>भुजाश्चास्य व्यवर्धन्त व्याप्नुवन्तो दिशो दश।<br>प्रदिशश्चैव खं गां वै पूरयामास केशवः॥ ३६रणभूमिमें श्रीवत्सधारी भगवान्‌के इस प्रकार कहनेपर दानवराज कालनेमि ठहाका मारकर हँस पड़ा और फिर उसने क्रोधवश हाथोंमें हथियार धारण कर लिया। क्रोधके कारण उसके नेत्र दुगुने लाल हो गये थे। उसने रणभूमिमें सभी प्रकारके अस्त्रोंको धारण करनेवाली अपनी सैकड़ों भुजाओंको उठाकर भगवान् विष्णुके वक्षःस्थलपर प्रहार किया। इसी प्रकार मय, तारक आदि अन्यान्य दानव भी खड्ग आदि आयुध लेकर युद्धस्थलमें भगवान् विष्णुपर टूट पड़े। यद्यपि सभी प्रकारके अस्त्रोंसे युक्त अत्यन्त बली दैत्य उनपर प्रहार कर रहे थे, तथापि वे विचलित नहीं हुए, अपितु युद्धभूमिमें पर्वतकी तरह अटल बने रहे। तब महान् असुर कालनेमि गरुडके साथ उलझ गया। उसने अपनी विशाल गदाको हाथोंमें धारण कर ली और क्रोधमें भरकर पूरी शक्तिके साथ उस चमकती हुई भयंकर गदाको गरुडके ऊपर छोड़ दिया। इस प्रकार उसके द्वारा फेंकी गयी वह गदा जब गरुडके मस्तकपर जा गिरी, तब दैत्यके उस कर्मसे भगवान् विष्णु आश्चर्यचकित हो उठे। फिर गरुडको पीड़ित तथा अपने शरीरको क्षत-विक्षत देखकर उनके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये। तब उन्होंने चक्र हाथमें उठाया। फिर तो वे सर्वव्यापी विष्णु गरुडके साथ वेगपूर्वक आगे बढ़े। उनकी भुजाएँ दसों दिशाओंमें व्यास होकर बढ़ने लगीं। इस प्रकार भगवान् केशवने प्रदिशाओं, आकाशमण्डल और भूतलको आच्छादित कर लिया॥ २८-३६॥
ववृधे च पुनर्लोकान् क्रान्तुकाम इवौजसा।<br>तर्जनायासुरेन्द्राणां वर्धमानं नभस्तले॥ ३७<br>ऋषयश्चैव गन्धर्वास्तुष्टुवुर्मधुसूदनम्।<br>सर्वान् किरीटेन लिहन् साभ्रमम्बरमम्बरैः॥ ३८<br>पद्भ्यामाक्रम्य वसुधां दिशः प्रच्छाद्य बाहुभिः।<br>स सूर्यकरतुल्याभं सहस्रारमरिक्षयम्॥ ३९पुनः वे अपने तेजसे लोकोंका अतिक्रमण करते हुए-से बढ़ने लगे। जिस समय वे आकाशमण्डलमें सुरेन्द्रोंको भयभीत करनेके लिये बढ़ रहे थे, उस समय ऋषिगण और गन्धर्व भगवान् मधुसूदनकी स्तुति कर रहे थे। वे अपने किरीटसे ऊपरी सभी लोकोंको तथा वस्त्रोंसे मेघसहित आकाशको छूते हुए पैरोंसे पृथ्वीको आक्रान्त करके और भुजाओंसे दिशाओंको आच्छादित करके स्थित थे। उनके चक्रकी कान्ति सूर्यकी किरणोंकी-सी उद्दीप्त थी। उसमें हजारों अरे लगे थे। वह शत्रुओंका
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