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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 739 of 1098

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Page 739

* अध्याय १७७ * । ७२९

रजास्त्रवती भीमा यक्षगन्धर्वशालिनी।<br>तयोश्चम्वोस्तदानीं तु बभूव स समागमः॥ २०<br>द्यावापृथिव्योः संयोगो यथा स्याद् युगपर्यये।<br>तद् युद्धमभवद् घोरं देवदानवसंकुलम्॥ २१<br>क्षमापराक्रमपरं दर्पस्य विनयस्य च।<br>निष्क्रमुर्बलाभ्यां तु भीमास्तत्र सुरासुराः॥ २२<br>पूर्वापराभ्यां संरब्धाः सागराभ्यामिवाम्बुदाः।<br>ताभ्यां बलाभ्यां संहृष्टाश्चेरूस्ते देवदानवाः॥ २३<br>वनाभ्यां पार्वतीयाभ्यां पुष्पिताभ्यां यथा गजाः।धारण किये हुए शोभा पा रही थी। उस समय उन दोनों सेनाओंका ऐसा समागम हुआ जैसे प्रलयकालमें पृथ्वी और आकाशमण्डलका संयोग होता है। देवताओं और दानवोंसे व्याप्त तथा दर्प और विनयकी क्षमा और पराक्रमसे युक्त वह युद्ध अत्यन्त भयंकर हो गया। वहाँ दोनों सेनाओंमेंसे कुछ ऐसे भयंकर देवता और राक्षस निकल रहे थे, जो पूर्वी एवं पश्चिमी सागरोंसे निकलते हुए संक्षुब्ध बादलों-जैसे प्रतीत हो रहे थे। उन दोनों सेनाओंसे निकले हुए वे देवता और दानव इस प्रकार हर्षपूर्वक विचरण कर रहे थे, मानो खिले हुए पुष्पोंसे युक्त पर्वतीय वनोंसे गजराज निकल रहे हों॥ १६-२३ १/२ ॥
समाजघ्नुस्ततो भेरीः शङ्खान् दध्मुborder/रनेकशः॥ २४<br>स शब्दो द्यां भुवं खं च दिशश्च समपूरयत्।<br>ज्याघाततलनिर्घोषो धनुषां कूजितानि च॥ २५<br>दुन्दुभीनां च निनदो दैत्यमन्तर्दधुः स्वनम्।<br>तेऽन्योन्यमभिसम्प्रेत्यः पातयन्तः परस्परम्॥ २६<br>बभञ्जुर्बाहुभिर्बाहून् द्वन्द्वमन्ये युयुत्सवः।<br>देवास्तु चाशनिं घोरं परिघांश्चोत्तमायसान्॥ २७<br>निस्त्रिंशान् ससृजुः संख्ये गदा गुर्वीश्च दानवाः।<br>गदानिपातैर्भग्नाङ्गा बाणैश्च शकलीकृताः॥ २८<br>परिपेतर्भृशं केचित् पुनः केचित् तु जघ्निरे।<br>ततो रथैः सतुरगैर्विमानैश्चाशुगामिभिः॥ २९<br>समीयुस्ते सुसंरब्धा रोषादन्योन्यमाहवे।<br>संवर्तमानाः समरे संदष्टौष्ठपुटाननाः॥ ३०<br>रथा रथैर्निरुद्ध्यन्ते पादाताश्च पदातिभिः।<br>तेषां रथानां तुमुलः स शब्दः शब्दवाहिनाम्॥ ३१<br>नभोनभश्व हि यथा नभस्यैर्जलदस्वनैः।<br>बभञ्जुस्तु रथान् केचित् केचित् सम्मर्दिता रथैः॥ ३२<br>सम्बाधमन्ये सम्प्राप्य न शेकुश्चलितुं रथाः।<br>अन्योन्यमन्ये समरे दोर्भ्यामुत्क्षिप्य दंशिताः॥ ३३<br>संहादमानाभरणा जघ्नुस्तत्रापि चर्मिणः।तदनन्तर नगाड़ोंपर चोटें पड़ने लगीं और अनेकों शङ्ख बज उठे। वह शब्द अन्तरिक्ष, पृथ्वी, आकाश और दिशाओंमें व्याप्त हो गया। धनुषोंकी प्रत्यञ्चा चढ़ानेके शब्द तथा सैनिकोंके कोलाहल होने लगे। देवताओंकी दुन्दुभियोंका निनाद दैत्योंके वाद्यशब्दको पराभूत कर दिया। फिर तो वे एक-दूसरेपर टूट पड़े और परस्पर एक-दूसरेको मारकर गिराने लगे। कुछ द्वन्द्व-युद्ध करनेवाले वीर अपनी भुजाओंसे शत्रु की भुजाओंको मरोड़ दिये। रणभूमिमें देवगण भयंकर अशनि और उत्तम लोहेके बने हुए परिघोंसे प्रहार कर रहे थे तो दानवगण भारी गदाओं और खड्गोंका प्रयोग कर रहे थे। गदाके आघातसे बहुतोंके अङ्ग चूर हो गये। कुछ लोग तो बाणोंकी चोटसे टुकड़े-टुकड़े हो गये। कुछ अत्यन्त घायल होकर धराशायी हो गये। कुछ पुनः उठकर प्रहार करने लगे। तदनन्तर वे क्रोधसे विक्षुब्ध हो रणभूमिमें घोड़े जुते रथों और शीघ्रगामी विमानोंद्वारा एक-दूसरेसे भिड़ गये। युद्ध करते समय वे क्रोधवश अपने होंठोंको दाँतों-तले दबाये हुए थे। इस प्रकार रथ रथोंके साथ तथा पैदल पैदलोंके साथ उलझ गये। शब्द करनेवाले उन रथोंका ऐसा भयंकर शब्द होने लगा मानो भाद्रपदमासमें बादल गरज रहे हों। कुछ लोग रथोंको तोड़ रहे थे और कुछ लोग रथोंके धक्केसे रौंदे जा चुके थे। दूसरे रथ मार्गके अवरुद्ध हो जानेके कारण आगे बढ़नेमें असमर्थ हो गये। कुछ कवचधारी वीर समरभूमिमें एक-दूसरेको दोनों हाथोंसे उठाकर भूतलपर पटक देते थे। उस समय उनके आभूषण खनखना रहे थे। वहाँ कुछ ढाल धारण करनेवाले दूसरे अस्त्रोंद्वारा भी विपक्षियोंपर प्रहार कर रहे थे॥ २४-३३ १/२ ॥