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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 735 of 1098

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Page 735

* अध्याय १७६ * ७२५

| नैशाकरी वारुणी च मायेऽन्तर्दधतुस्ततः।<br>असिभिश्चायसगणैः किरन् देवगणान् रणे॥ २६<br><br>साश्मयन्त्रायुधघना द्रुमपर्वतसङ्कटा।<br>अभवद् घोरसंचारा पृथिवी पर्वतैरिव॥ २७<br><br>अश्मना प्रहताः केचिच्छिलाभिः शकलीकृताः।<br>नानिरुद्धो द्रुमगणैर्देवोऽदृश्यत कश्चन॥ २८<br><br>तदपध्वस्तधनुषं भग्नप्रहरणाविलम्।<br>निष्प्रयत्नं सुरानीकं वर्जयित्वा गदाधरम्॥ २९<br><br>स हि युद्धगतः श्रीमानीशो न स्म व्यकम्पत।<br>सहिष्णुत्वाज्जगत्स्वामी न चुक्रोध गदाधरः॥ ३०<br><br>कालज्ञः कालमेघाभः समीक्ष्य कालमाहवे।<br>देवासुरविमर्दं तु द्रष्टुकामस्तदा हरिः॥ ३१ | उसके प्रभावसे चन्द्रमा और वरुणकी दोनों मायाएँ अन्तर्हित हो गयीं। वह दैत्य रणभूमिमें देवगणोंके ऊपर तलवारों और लोहनिर्मित अन्यान्य अस्त्रोंका प्रयोग कर रहा था। उसने रणभूमिको शिलाओं, यन्त्रों, अस्त्रों, वृक्षों और पर्वतोंसे ऐसा सघनरूपसे पाट दिया कि वहाँकी पृथ्वी पर्वतोंकी तरह चलने-फिरनेके लिये दुर्गम हो गयी। उस समय कुछ देवता पत्थरोंसे आहत कर दिये गये, कुछ शिलाओंकी मारसे खण्ड-खण्ड कर दिये गये तथा कोई भी देवता ऐसा नहीं दीख रहा था, जो वृक्षसमूहोंसे ढक न गया हो। इस प्रकार एकमात्र भगवान् गदाधरको छोड़कर देवताओंकी उस सेनाके धनुष छिन्न-भिन्न हो गये, अस्त्रसमूह नष्ट हो गये और वह प्रयत्नहीन हो गयी। शोभाशाली परमेश्वर गदाधर युद्धस्थलमें उपस्थित होनेपर भी विचलित नहीं हुए तथा सहनशील होनेके कारण उन जगदीश्वरको क्रोध भी नहीं आया। काले मेघकी-सी कान्तिवाले कालके ज्ञाता श्रीहरि रणभूमिमें देवताओं और असुरोंके युद्धको देखनेकी इच्छासे कालकी प्रतीक्षा करते हुए स्थित थे॥ २१—३१॥ |
| ततो भगवता दृष्टो रणे पावकमारुतौ।<br>चोदितौ विष्णुवाक्येन तौ मायामपकर्षताम्॥ ३२<br><br>ताभ्यामुद्भ्रान्तवेगाभ्यां प्रवृद्धाभ्यां महाहवे।<br>दग्धा सा पार्वती माया भस्मीभूता ननाश ह॥ ३३<br><br>सोऽनिलोऽनलसंयुक्तः सोऽनलश्चानिलाकुलः।<br>दैत्यसेनां ददहतुर्युगान्तेष्विव मूर्च्छितौ॥ ३४<br><br>वायुः प्रधावितस्तत्र पश्चादग्निस्तु मारुतम्।<br>चेरतुर्दानवानीके क्रीडन्तावनिलानलौ॥ ३५<br><br>भस्मावयवभूतेषु प्रपतत्सूत्पतत्सु च।<br>दानवानां विमानेषु निपतत्सु समन्ततः॥ ३६<br><br>वातस्कन्धापविद्धेषु कृतकर्मणि पावके।<br>मायाबन्धे निवृत्ते तु स्तूयमाने गदाधरे॥ ३७<br><br>निष्प्रयत्नेषु दैत्येषु त्रैलोक्ये मुक्तबन्धने।<br>सम्पहृष्टेषु देवेषु साधु साध्विति सर्वशः॥ ३८<br><br>जये दशशताक्षस्य दैत्यानां च पराजये।<br>दिक्षु सर्वासु शुद्धासु प्रवृत्ते धर्मविस्तरे॥ ३९<br><br>अपावृते चन्द्रमसि स्वस्थानस्थे दिवाकरे।<br>प्रकृतिस्थेषु लोकेषु त्रिषु चारित्रबन्धुषु॥ ४० | तदनन्तर रणभूमिमें भगवान्को अग्नि और वायु दीख पड़े। तब भगवान् विष्णुने उन्हें प्रेरित किया कि तुम दोनों इस मायाको नष्ट कर डालो। तब वृद्धिकी अन्तिम सीमापर पहुँचे हुए उन प्रचण्ड वेगशाली वायु और अग्निके प्रभावसे उस महासमरमें वह पार्वती माया जलकर भस्म हो गयी और सर्वथा नष्ट हो गयी। इसके बाद अग्निसे संयुक्त वायु और वायुसे संयुक्त अग्नि—दोनों पूरी शक्ति लगाकर युगान्तकी तरह दैत्यसेनाको भस्म करने लगे। आगे-आगे वायुदेव चलते थे, फिर वायुदेवके पीछे अग्निदेव चलते थे। इस प्रकार अग्नि और वायु उस दानव-सेनामें क्रीडा करते हुए विचरण कर रहे थे। दानवोंकी सेना जलती हुई इधर-उधर भागने लगी और विमान चारों ओर जलकर गिरने लगे। दानवोंके कंधे वायुसे अकड़ गये। इस प्रकार अग्निद्वारा अपना कर्म कर चुकनेपर मायाका बन्धन निवृत्त हो गया, भगवान् गदाधरकी स्तुति की जाने लगी, दैत्यगण प्रयत्नहीन हो गये, त्रिलोकी बन्धनसे मुक्त हो गयी, परम प्रसन्न हुए देवगण सब ओर 'ठीक है, ठीक हैं' ऐसा शब्द बोलने लगे। इन्द्रकी विजय और दैत्योंकी पराजय हो गयी, सभी दिशाएँ शुद्ध हो गयीं, धर्मका विस्तार होने लगा।' चन्द्रमाका आवरण हट गया, सूर्य अपने स्थानपर स्थित हो गये, तीनों लोक निश्चिन्त हो गये, लोगोंमें |