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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 729 of 1098

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Page 729
* अध्याय १७५ *७१९
मायामौर्वीं समासाद्य दह्यमाना दिवौकसः।<br>भेजिरे चेन्द्रविषयं शीतांशुसलिलप्रदम्॥ २०<br>ते दह्यमाना ह्यौर्वेण वह्निना नष्टचेतसः।<br>शशंसुर्वज्रिणं देवाः संतप्ताः शरणैषिणः॥ २१हुए। इस प्रकार और्वी मायाके सम्पर्कसे जलते हुए देवगण शीतल किरणोंवाले एवं जलप्रदाता इन्द्रकी शरणमें गये। और्व अग्निसे जलनेके कारण देवताओंकी चेतना नष्ट हो रही थी। तब संतप्त हुए देवगणोंने शरणकी इच्छासे वज्रधारी इन्द्रके पास जाकर उन्हें सूचित किया॥ १२—२१॥
संतप्ते मायया सैन्ये हन्यमाने च दानवैः।<br>चोदितो देवराजेन वरुणो वाक्यमब्रवीत्॥ २२<br>ऊर्वो ब्रह्मर्षिजः शक्र तपस्तेपे सुदारुणम्।<br>ऊर्वः स पूर्वतेजस्वी सदृशो ब्रह्मणो गुणैः॥ २३<br>तं तपन्तमिवादित्यं तपसा जगदव्ययम्।<br>उपतस्थुर्मुनिगणा दिव्या देवर्षिभिः सह॥ २४<br>हिरण्यकशिपुश्चैव दानवो दानवेश्वरः।<br>ऋषिं विज्ञापयामासुः पुरा परमतेजसम्॥ २५<br>ऊचुर्ब्रह्मर्षयस्तं तु वचनं धर्मसंहितम्।<br>ऋषिवंशेषु भगवंश्छिन्नमूलमिदं पदम्॥ २६<br>एकस्त्वमनपत्यश्च गोत्रायान्यो न वर्तते।<br>कौमारं व्रतमास्थाय क्लेशमेवानुवर्तसे॥ २७<br>बहूनि विप्रगोत्राणि मुनीनां भावितात्मनाम्।<br>एकदेहानि तिष्ठन्ति विविक्तानि विना प्रजाः॥ २८<br>एवमुच्छिन्नमूलैश्च पुत्रैर्नो नास्ति कारणम्।<br>भवांस्तु तपसा श्रेष्ठो प्रजापतिसमद्युतिः॥ २९<br>तत्र वर्तस्व वंशाय वर्धयात्मानमात्मना।<br>त्वया धर्मोर्जितस्तेन द्वितीयां कुरु वै तनुम्॥ ३०इस प्रकार अपनी सेनाको मायाद्वारा संतप्त होती तथा दानवोंद्वारा मारी जाती देखकर देवराज इन्द्रके पूछनेपर वरुणने इस प्रकार कहा—'इन्द्र! ऊर्व एक ब्रह्मर्षिके पुत्र हैं। वे पहलेसे ही तेजस्वी और गुणोंमें ब्रह्माके समान थे। उन्होंने अत्यन्त कठोर तप किया था। जब उनकी तपस्यासे सारा जगत् सूर्यकी भाँति संतप्त हो उठा, तब उनके निकट देवर्षियोंसहित दिव्य महर्षिगण उपस्थित हुए। उसी समय वहाँ दानवेश्वर हिरण्यकशिपु दानव भी पहुँचा। तब ब्रह्मर्षियोंने सर्वप्रथम उन परम तेजस्वी ऊर्व ऋषिको सूचना दी और फिर इस प्रकार धर्मयुक्त कहा—'ऐश्वर्यशाली ऊर्व! ऋषियोंके वंशोंमें इस संतान-परम्पराकी जड़ कट चुकी है। एकमात्र आप शेष हैं, सो भी संतानहीन हैं। दूसरा कोई गोत्रकी वृद्धि करनेवाला विद्यमान है नहीं और आप ब्रह्मचर्य-व्रतको धारणकर क्लेश सहन करते हुए तपमें ही लगे हुए हैं। भावितात्मा मुनियों तथा ब्राह्मणोंके बहुत-से गोत्र संततिके बिना केवल एक व्यक्तितक ही सीमित रह गये हैं। इस प्रकार मूलके नष्ट हो जानेपर हमलोगोंको पुनः पुत्रोत्पत्तिका कोई कारण नहीं दीख रहा है। आप तो तपस्याके प्रभावसे श्रेष्ठ और प्रजापतिके समान तेजस्वी हो गये हैं, अतः वंश-प्राप्तिके लिये प्रयत्न कीजिये और अपने द्वारा अपनी वृद्धि कीजिये। आपने धर्मोपार्जन तो कर ही लिया है, इसलिये अब दूसरे शरीरकी रचना कीजिये अर्थात् संतानोत्पत्तिके लिये प्रयत्नशील होइये'॥ २२—३०॥
स एवमुक्तो मुनिभिर्हूर्वो मर्मसु ताडितः।<br>जगर्हे तानृषिगणान् वचनं चेदमब्रवीत्॥ ३१<br>यथायं विहितो धर्मो मुनीनां शाश्वतस्तु सः।<br>आर्षं वै सेवतः कर्म वन्यमूलफलाशिनः॥ ३२<br>ब्रह्मयोनौ प्रसूतस्य ब्राह्मणस्यात्मदर्शिनः।<br>ब्रह्मचर्यं सुचरितं ब्रह्माणमपि चालयेत्॥ ३३<br>जनानां वृत्तयस्तिस्रो ये गृहाश्रमवासिनः।<br>अस्माकं तु वरं वृत्तिर्वनाश्रमनिवासिनाम्॥ ३४मुनियोंद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर ऊर्व ऋषिके मर्मस्थानोंपर विशेष आघात पहुँचा, तब उन्होंने उन ऋषियोंकी निन्दा करते हुए इस प्रकार कहा—'ब्राह्मणकुलोत्पन्न जंगली फल-मूलका आहार करते हुए आर्ष कर्मके सेवनमें निरत आत्मदर्शी ब्राह्मणका भलीभाँति आचरण किया गया ब्रह्मचर्य ब्रह्माको भी विचलित कर सकता है। जो गृहस्थाश्रममें निवास करनेवाले हैं, उन लोगोंके लिये अन्य तीन वृत्तियाँ बतलायी गयी हैं, परंतु वनमें आश्रम बनाकर निवास करनेवाले हमलोगोंके लिये यही वृत्ति उत्तम है।