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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 721 of 1098

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Page 721
* अध्याय १७३ *७११
महर्षयो वीतशोका वेदानुच्चैरधीयत।<br>यज्ञेषु च हविः पाकं शिवमप च पावकः॥ ५०<br><br>प्रवृत्तधर्माः संवृत्ता लोका मुदितमानसाः।<br>विष्णोर्दत्तप्रतिज्ञस्य श्रुत्वारिनिधने गिरम्॥ ५१शुभकारिणी हो गयीं। महर्षियोंका शोक नष्ट हो गया, वे उच्च स्वरसे वेदोंका अध्ययन करने लगे। यज्ञोंमें अग्निको पके हुए मङ्गलकारक हविकी प्राप्ति होने लगी। इस प्रकार शत्रुके विनाश करनेके विषयमें दत्तप्रतिज्ञ भगवान् विष्णुकी वाणी सुनकर सभी लोगोंका मन हर्षित हो गया, तब वे अपने-अपने धर्मोंमें संलग्न हो गये।

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे तारकामयसंग्रामे द्विसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १७२ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके तारकामयसंग्राममें एक सौ बहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १७२ ॥


एक सौ तिहत्तरवाँ अध्याय

दैत्यों और दानवोंकी युद्धार्थ तैयारी

मत्स्य उवाचमत्स्यभगवान्बोले—
ततोऽभयं विष्णुवचः श्रुत्वा दैत्याश्च दानवाः।<br>उद्योगं विपुलं चक्रुर्यूद्धाय विजयाय च॥ १<br><br>मयस्तु काञ्चनमयं त्रिनल्वायतमक्षयम्।<br>चतुश्चक्रं सुविपुलं सुकम्पितमहायुगम्॥ २<br><br>किङ्किणीजालनिर्घोषं द्वीपिचर्मपरिष्कृतम्।<br>रुचिरं रत्नजालैश्च हेमजालैश्च शोभितम्॥ ३<br><br>ईहामृगगणाकीर्णं पक्षिपङ्क्तिविराजितम्।<br>दिव्यास्त्रतूणीरधरं पयोधरनिनादितम्॥ ४<br><br>स्वक्षं रथवरोदारं सूपस्थं गगनोपमम्।<br>गदापरिघसम्पूर्णं मूर्तिमन्तमिवार्णवम्॥ ५<br><br>हैमकेयूरवलयं स्वर्णमण्डलकूबरम्।<br>सपताकध्वजोपेतं सादित्यमिव मन्दरम्॥ ६<br><br>गजेन्द्राभोगवपुषं क्वचित् केसरिवर्चसम्।<br>युक्तमृक्षसहस्रेण समृद्धाम्बुदनादितम्॥ ७<br><br>दीप्तमाकाशगं दिव्यं रथं पररथारुजम्।<br>अध्यतिष्ठद्रणाकाङ्क्षी मेरुं दीप्त इवांशुमान्॥ ८रविनन्दन ! तदनन्तर देवताओंके लिये उपयुक्त भगवान् विष्णुके उस अभयदायक वचनको सुनकर दैत्य और दानव युद्ध एवं उसमें विजयप्राप्तिके लिये महान् उद्योग करने लगे। उस समय युद्धाकाङ्क्षी मय एक ऐसे दिव्य रथपर सवार हुआ, जो सोनेका बना हुआ था। वह अविनाशी रथ तीन नल्व* विस्तारवाला अत्यन्त विशाल तथा चार पहियों और परम सुन्दर महान् जुएसे युक्त था। उसमें क्षुद्र घंटिकाओंके रुनझुन शब्द हो रहे थे। वह गैंडेके चमड़ेसे आच्छादित, रत्नों और सुवर्णकी सुन्दर जालियोंसे सुशोभित, भेड़ियों और पङ्क्तिबद्ध पक्षियोंकी पच्चीकारीसे समलंकृत तथा दिव्यास्त्र और तरकससे परिपूर्ण था। उससे मेघकी गड़गड़ाहटके समान शब्द निकल रहा था। वह श्रेष्ठ रथ सुन्दर धुरी और सुदृढ़ मध्यभागसे युक्त, आकाशमण्डल-जैसा विस्तृत तथा गदा और परिघसे परिपूर्ण होनेके कारण मूर्तिमान् सागर-सा लग रहा था। उसके केयूर, वलय और कूबर (युगंधर) सोनेके बने हुए थे तथा उसपर पताकाएँ और ध्वज फहरा रहे थे, जिससे वह सूर्ययुक्त मन्दराचलकी भाँति शोभित हो रहा था। उसका ऊपरी भाग कहीं गजेन्द्र-चर्म तो कहीं सिंह-चर्म-जैसा चमक रहा था। उसमें एक हजार रीछ जुते हुए थे, वह घने बादलकी तरह शब्द कर रहा था, शत्रुओंके रथको रौंदनेवाला वह दीप्तिशाली रथ आकाशगामी था, उसपर बैठा हुआ मय ऐसा लग रहा था मानो दीप्तिमान् सूर्य सुमेरु पर्वतपर विराजमान हों॥ १—८॥

* एक फलाँगका एक प्राचीन माप।