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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 716 of 1098

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Page 716

७०६ * मत्स्यपुराण *


श्लोकअर्थ
मरुत्वती मरुत्वतो देवानजनयत् सुतान्॥ ५१<br>अग्निं चक्षुं रविर्ज्योतिः सावित्रं मित्रमेव च।<br>अमरं शरवृष्टिं च सुकर्षं च महाभुजम्॥ ५२<br>विराजं चैव वाचं च विश्वावसुमतिं तथा।<br>अश्वमित्रं चित्ररश्मिं तथा निषधनं नृप॥ ५३<br>ह्वन्तं वाडवं चैव चारित्रं मन्दपन्नगम्।<br>बृहन्तं वै बृहद्रूपं तथा वै पूतनानुगम्॥ ५४<br>मरुत्वती पुरा जज्ञे एतान् वै मरुतां गणान्।<br>अदितिः कश्यपाज्जज्ञ आदित्यान् द्वादशैव हि॥ ५५<br>इन्द्रो विष्णुर्भगस्त्वष्टा वरुणो हार्यमा रविः।<br>पूषा मित्रश्च धनदो धाता पर्जन्य एव च॥ ५६<br>इत्येते द्वादशादित्या वरिष्ठास्त्रिदिवौकसः।<br>आदित्यस्य सरस्वत्यां जज्ञाते द्वौ सुतौ वरौ॥ ५७<br>तपःश्रेष्ठौ गुणिश्रेष्ठौ त्रिदिवस्यापि सम्मतौ।<br>दनुस्तु दानवाञ्जज्ञे दितिर्दैत्यान् व्यजायत॥ ५८<br>काला तु वै कालकेयानसुरान् राक्षसांस्तु वै।<br>अनायुषायास्तनया व्याधयः सुमहाबलाः॥ ५९<br>सिंहिका ग्रहमाता वै गन्धर्वजननी मुनिः।<br>ताम्रा त्वप्सरसां माता पुण्यानां भारर्तोद्भव॥ ६०<br>क्रोधायाः सर्वभूतानि पिशाचांश्चैव पार्थिव।<br>जज्ञे यक्षगणांश्चैव राक्षसांश्च विशाम्पते॥ ६१इसी प्रकार मरुत्वतीने मरुत् देवताओंको पुत्ररूपमें उत्पन्न किया। अग्नि, चक्षु, रवि, ज्योति, सावित्र, मित्र, अमर, शरवृष्टि, महाभुज सुकर्ष, विराज, वाच, विश्वावसु, मति, अश्वमित्र, चित्ररश्मि, निषधन, ह्वन्त, वाडव, चारित्र, मन्दपन्नग, बृहन्त, बृहद्रूप तथा पूतनानुग—इन मरुद्गणोंको पूर्वकालमें मरुत्वतीने जन्म दिया था। अदितिने कश्यपके संयोगसे बारह आदित्योंको उत्पन्न किया। उनके नाम हैं—इन्द्र, विष्णु, भग, त्वष्टा, वरुण, अर्यमा, रवि, पूषा, मित्र, धनद, धाता और पर्जन्य। ये बारह आदित्य देवताओंमें सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं। आदित्यके सरस्वतीके गर्भसे दो श्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न हुए, जो तपस्वियोंमें श्रेष्ठ, गुणवानोंमें प्रधान और देवताओंके लिये भी पूजनीय कहे जाते हैं। दनुने दानवोंको और दितिने दैत्योंको उत्पन्न किया। कालाने कालकेय नामक असुरों और राक्षसोंको जन्म दिया। अत्यन्त बलवती व्याधियाँ अनायुषाकी संतान हैं। सिंहिका राहुग्रहकी माता है और मुनि गन्धर्वोंकी जननी कही जाती है। भरतकुलोत्पन्न राजन्! ताम्रा पवित्रात्मा अप्सराओंकी माता है। क्रोधासे सभी भूत और पिशाच पैदा हुए। विशाम्पते! क्रोधाने यक्षगणों और राक्षसोंको भी जन्म दिया था॥ ५१—६१॥
चतुष्पदानि सत्त्वानि तथा गावस्तु सौरभाः।<br>सुपर्णान् पक्षिणश्चैव विनता चाप्यजायत॥ ६२<br>महीधरान् सर्वनागान् देवी कद्रूर्व्यजायत।<br>एवं वृद्धिं समगमन् विश्वे लोकाः परंतप॥ ६३<br>तदा वै पौष्करो राजन् प्रादुर्भावो महात्मनः।<br>प्रादुर्भावो पौष्करस्ते मया द्वैपायनेरितः॥ ६४<br>पुराणः पुरुषश्चैव मया विष्णुर्हरिः प्रभुः।<br>कथितस्तेऽनुपूर्व्येण संस्तुतः परमर्षिभिः॥ ६५<br>यश्चेदमग्र्यं शृणुयात् पुराणं<br>सदा नरः पर्वसु गौरवेण।<br>अवाप्य लोकान् स हि वीतरागः<br>परत्र च स्वर्गफलानि भुङ्क्ते॥ ६६<br>चक्षुषा मनसा वाचा कर्मणा च चतुर्विधम्।<br>प्रसादयति यः कृष्णं तं कृष्णोऽनुप्रसीदति॥ ६७राजन्! सभी चौपाये जीव तथा गौएँ सुरभीकी संतान हैं। विनताने सुन्दर पंखधारी पक्षियोंको पैदा किया। कद्रूदेवीने पृथ्वीको धारण करनेवाले सभी प्रकारके नागोंको उत्पन्न किया। परंतप! इसी प्रकार विश्वमें लोकसृष्टि वृद्धिको प्राप्त हुई है। राजन्! यही महात्मा विष्णुका पुष्करसम्बन्धी प्रादुर्भाव है। व्यासद्वारा कहे गये इस पौष्कर प्रादुर्भावका तथा जो पुराणपुरुष, सर्वव्यापी और महर्षियोंद्वारा संस्तुत हैं, उन भगवान् श्रीहरिका वर्णन मैंने तुम्हें आनुपूर्वी सुना दिया। जो मनुष्य सदा पर्वोंके समय गौरवपूर्वक इस श्रेष्ठ पुराणको श्रवण करता है, वह वीतराग होकर लौकिक सुखोंका उपभोग करके परलोकमें स्वर्गफलोंका भोग करता है। जो मनुष्य श्रीकृष्णको नेत्र, मन, वचन और कर्म—इन चारों प्रकारोंसे प्रसन्न करता है तो श्रीकृष्ण भी उसे उसी प्रकार आनन्दित करते हैं।