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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 713 of 1098

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Page 713
* अध्याय १७१ *७०३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तौ प्राप्तावूचतुस्तत्र ब्रह्माणममितौजसम्।<br>परावरविशेषज्ञौ पूजितौ च महर्षिभिः॥ ५<br><br>ब्रह्मात्मदृढबन्धश्च विशालो जगदास्थितः।<br>ग्रामणीः सर्वभूतानां ब्रह्मा त्रैलोक्यपूजितः॥ ६<br><br>तयोस्तद्वचनं श्रुत्वा ब्रह्माभ्याहतयोगवित्।<br>त्रीनिमान् कृतवाँल्लोकान् यथेयं ब्रह्मणः श्रुतिः॥ ७<br><br>पुत्रं च शम्भवे चैकं समुत्पादितवान् ऋषिः।<br>तस्याग्रे वाग्यतस्तस्थौ ब्रह्माणमजमव्ययम्॥ ८<br><br>सोत्पन्नमात्रो ब्रह्माणमुक्तवान् मानसः सुतः।<br>किं कुर्मस्तव साहाय्यं ब्रवीतु भगवान् ऋषिः॥ ९कपिलजी भी उपस्थित हुए। वे दोनों महात्मा परावरके विशेषज्ञ, महर्षियोंद्वारा पूजित और अपने-अपने मार्गमें तत्पर रहनेवाले थे। वे वहाँ पहुँचकर अमित तेजस्वी ब्रह्माकी प्रशंसा करते हुए बोले—'सर्वश्रेष्ठ', जगत्के रचयिता, त्रिलोकीद्वारा पूजित, सभी प्राणियोंके नायक ब्रह्मा अपने सुदृढ़ आसनपर विराजमान हैं।' उन दोनोंकी वह बात सुनकर पूर्वकथित योगके ज्ञाता ब्रह्माने इन तीन लोकोंकी रचना की, ब्रह्माके विषयमें यह श्रुति प्रसिद्ध है। उस समय ऋषिश्रेष्ठ ब्रह्माने जगत्के कल्याणके लिये एक पुत्र उत्पन्न किया। ब्रह्माका वह मानस पुत्र उत्पन्न होते ही उनके समक्ष चुपचाप खड़ा हो गया और फिर उन अजन्मा अविनाशी ब्रह्मासे इस प्रकार बोला—'आप ऐश्वर्यशाली ऋषि बतलावें कि मैं आपकी कौन-सी सहायता करूँ?'॥ १—९॥
ब्रह्मोवाच<br><br>य एष कपिलो ब्रह्म नारायणमयस्तथा।<br>वदते भवतस्तत्त्वं तत्कुरुष्व महामते॥ १०<br><br>ब्रह्मणस्तु तदर्थं तु तदा भूयः समुत्थितः।<br>शुश्रूषुरस्मि युवयोः किं करोमि कृताञ्जलिः॥ ११ब्रह्माने कहा—महामते! ये जो महर्षि कपिल और नारायणस्वरूप ब्रह्म सामने उपस्थित हैं, ये दोनों तुमसे जिस तत्त्वका वर्णन करें, तुम वैसा ही करो। ब्रह्माके उस अभिप्रायको जानकर वह पुनः उठ खड़ा हुआ और उनके समक्ष जाकर हाथ जोड़कर बोला—'मैं आपलोगोंका आदेश सुनना चाहता हूँ, कहिये क्या करूँ?'॥ १०-११॥
श्रीभगवानुवाच<br><br>यत्सत्यमक्षरं ब्रह्म ह्यष्टादशविधं तु तत्।<br>यत्सत्यं यदृतं तत्तु परं पदमनुस्मर॥ १२<br><br>एतद्वचो निशम्यैव ययौ स दिशमुत्तराम्।<br>गत्वा च तत्र ब्रह्मत्वमगमज्ज्ञानतेजसा॥ १३<br><br>ततो ब्रह्मा भुवं नाम द्वितीयमसृजत् प्रभुः।<br>संकल्पयित्वा मनसा तमेव च महामनाः॥ १४<br><br>ततः सोऽथाब्रवीद् वाक्यं किं करोमि पितामह।<br>पितामहसमाज्ञातो ब्रह्माणं समुपस्थितः॥ १५<br><br>ब्रह्माभ्यासं तु कृतवान् भुवश्च पृथिवीं गतः।<br>प्राप्तं च परमं स्थानं स तयोः पार्श्वमागतः॥ १६<br><br>तस्मिन्नपि गते पुत्रे तृतीयमसृजत् प्रभुः।<br>सांख्यप्रवृत्तिकुशलं भूर्भुवं नामतो विभुम्॥ १७<br><br>गोपतित्वं समासाद्य तयोरेवागमद् गतिम्।<br>एवं पुत्रास्त्रयोऽप्येत उक्ताः शम्भोर्महात्मनः॥ १८श्रीभगवान् बोले—ब्रह्मन्! जो सत्य और अविनाशी ब्रह्म है, वह अठारह प्रकारका है। जो सत्य है, जो ऋत है, वही परम पद है। तुम उसका अनुस्मरण करो। ऐसी बात सुनते ही वह उत्तर दिशाकी ओर चला गया और वहाँ जाकर उसने अपने ज्ञानके तेजसे ब्रह्मत्वको प्राप्त कर लिया। तत्पश्चात् महामना एवं सामर्थ्यशाली ब्रह्माने मानसिक संकल्पद्वारा 'भुव' नामक दूसरे पुत्रकी सृष्टि की। तब उसने भी ब्रह्माके समक्ष खड़ा होकर इस प्रकार कहा—'पितामह! मैं कौन-सा कार्य करूँ?' फिर ब्रह्माकी आज्ञासे वह ब्रह्मके निकट गया। तदुपरान्त 'भुव' ने भूतलपर आकर ब्रह्मका अभ्यास किया और ब्रह्म एवं महर्षि कपिलके पास आकर परम पदको प्राप्त कर लिया। उस पुत्रके भी चले जानेपर भगवान् ब्रह्माने 'भूर्भुव' नामक तीसरे पुत्रको प्रकट किया, जो सर्वव्यापी और सांख्यशास्त्रमें परम प्रवीण था। यह भी इन्द्रियजयी होकर उन दोनों भाइयोंकी गतिको प्राप्त हो गया। इस प्रकार कल्याणकारी महात्मा ब्रह्माके ये तीनों पुत्र कहे गये हैं।