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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 710 of 1098

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Page 710

७०० * मत्स्यपुराण *


एक सौ सत्तरवाँ अध्याय

मधु-कैटभकी उत्पत्ति, उनका ब्रह्माके साथ वार्तालाप और भगवान्द्वारा वध

मत्स्य उवाचमत्स्यभगवान्ने कहा— राजन्! भगवान्के योगनिद्राके वशीभूत हो शयन करते समय मधु नामका महान् असुर उत्पन्न हुआ, जो ब्रह्माजीकी तपस्यामें विघ्नस्वरूप था। तत्पश्चात् उसीके साथ रजोगुणसे युक्त कैटभ भी उत्पन्न हुआ। रजोगुण और तमोगुणसे युक्त एवं विघ्नस्वरूप उत्पन्न हुए वे दोनों महाबली तामसी असुर एकार्णवके जलमें सम्पूर्ण जगत्को क्षुब्ध कर रहे थे। वे लाल रंगका दिव्य वस्त्र धारण किये हुए थे, उनकी श्वेत वर्णकी दाढ़ोंके अग्रभाग चमक रहे थे, वे उद्दीप्त किरीट और कुण्डल तथा उज्ज्वल केयूर और कंकणसे विभूषित थे, उनके लाल रंगके विशाल नेत्र खुले हुए थे, उनकी छाती मोटी और भुजाएँ लम्बी थीं, उनका शरीर विशाल पर्वतके समान था, वे चलते हुए पर्वत-जैसा जान पड़ते थे, उनकी शरीर-कान्ति नूतन मेघ-जैसी थी, उनका मुख सूर्यके समान प्रकाशमान था, वे बिजलीकी तरह चमक रहे थे और हाथमें गदा धारण करनेके कारण अत्यन्त भयानक दीख रहे थे, चलते समय वे पैरोंको इस प्रकार रख रहे थे मानो समुद्रको उछाल रहे हों और शयन करते हुए भगवान् मधुसूदनको कम्पित-सा कर रहे थे। इस प्रकार वहाँ विचरण करते हुए उन दोनोंने कमलपर उद्भासित होते हुए चारों ओर मुखवाले योगियोंमें श्रेष्ठ ब्रह्माके निकट पहुँचकर उन्हें नारायणकी आज्ञासे मानसिक संकल्पद्वारा समस्त प्रजाओं, सम्पूर्ण देवताओं, असुरों और ऋषियोंकी सृष्टि करते हुए देखा। वे दोनों असुरश्रेष्ठ अपनी कान्तिसे उद्दीप्त, क्रोधसे परिपूर्ण और आसन्नमृत्यु थे, उनके नेत्र क्रोधसे व्याकुल हो रहे थे। उन्होंने ब्रह्मासे पूछा—'श्वेत रंगकी पगड़ी बाँधे, चार भुजाधारी एवं कमलके मध्यमें स्थित तुम कौन हो? तुम मोहवश नियम धारणकर यहाँ शान्तचित्त होकर क्यों बैठे हो? कमलजन्मा! तुम यहाँ आओ और हम दोनोंके साथ युद्ध करो। हम दोनों सामर्थ्यशालियोंके अतिरिक्त तुम इस महासागरमें स्थित नहीं रह सकते। तुम्हें उत्पन्न करनेवाला कौन है? तुम किसके द्वारा इस काममें नियुक्त किये गये हो? तुम्हारी सृष्टि करनेवाला कौन है? तुम्हारा रक्षक कौन है? तुम किस नामसे पुकारे जाते हो?'॥ १—१२॥
विघ्नस्तपसि सम्भूतो मधुर्नाम महासुरः।<br>तेनैव च सहोद्भूतो रजसा कैटभस्ततः॥ १॥<br><br>तौ रजस्तमसौ विघ्नसंभूतौ तामसौ गणौ।<br>एकार्णवे जगत् सर्वं क्षोभयन्तौ महाबलौ॥ २॥<br><br>दिव्यरक्ताम्बरधरौ श्वेतदीप्ताग्रदंष्ट्रिणौ।<br>किरीटकुण्डलोदग्रौ केयूरवलयोज्ज्वलौ॥ ३॥<br><br>महाविवृतताम्राक्षौ पीनोरस्कौ महाभुजौ।<br>महागिरेः संहननौ जङ्गमाविव पर्वतौ॥ ४॥<br><br>नवमेघप्रतीकाशावादित्यसदृशाननौ ।<br>विद्युदाभौ गदाग्राभ्यां कराभ्यामतिभीषणौ॥ ५॥<br><br>तौ पादयोस्तु विन्यासादुत्क्षिपन्ताविषार्णवम्।<br>कम्पयन्ताविव हरिं शयानं मधुसूदनम्॥ ६॥<br><br>तौ तत्र विचरन्तौ स्म पुष्करे विश्वतोमुखम्।<br>योगिनां श्रेष्ठमासाद्य दीप्तं ददृशतुस्तदा॥ ७॥<br><br>नारायणसमाज्ञातं सृजन्तमखिलाः प्रजाः।<br>दैवतानि च विश्वानि मानसान्सुरानृषीन्॥ ८॥<br><br>ततस्तावूचतुस्तत्र ब्रह्माणमसुरोत्तमौ।<br>दीप्तौ मुमूर्षू संक्रुद्धौ रोषव्याकुलितेक्षणौ॥ ९॥<br><br>कस्त्वं पुष्करमध्यस्थः सितोष्णीषश्चतुर्भुजः।<br>आधाय नियमं मोहादास्से त्वं विगतज्वरः॥ १०॥<br><br>एह्यागच्छावयोर्युद्धं देहि त्वं कमलोद्भव।<br>आवाभ्यां परमीशाभ्यामशक्तस्त्वमिहार्णवे॥ ११॥<br><br>तत्र कश्चौद्भवस्तुभ्यं केन वासि नियोजितः।<br>कः स्रष्टा कश्च ते गोप्ता केन नाम्ना विधीयसे॥ १२॥