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Read in context| ६९४ | * मत्स्यपुराण * |
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| ऋतुभिर्यजमानांश्च समाप्तवरदक्षिणान्।<br>अपश्यद्देवकुक्षिस्थान्याजकाञ्छतशो द्विजान्॥ २८<br><br>सद्वृत्तमास्थिताः सर्वे वर्णा ब्राह्मणपूर्वकाः।<br>चत्वारश्चाश्रमाः सम्यग्यथोद्दिष्टा मया तव॥ २९ | आश्रमों तथा कुक्षिके भीतर स्थित सैकड़ों याजक ब्राह्मणोंको देखा, जो कहीं यज्ञोंद्वारा यजन कर रहे थे और कहीं यज्ञ समाप्त होनेके पश्चात् उत्तम दक्षिणाओंसे युक्त थे। जैसा मैंने तुम्हें पहले बतलाया है, उसके अनुसार ब्राह्मण आदि सभी वर्णों तथा चारों आश्रमोंके लोग सम्यक् प्रकारसे सदाचारका पालन करते थे॥ २८—२९॥ |
| एवं वर्षशतं साग्रं मार्कण्डेयस्य धीमतः।<br>चरतः पृथिवीं सर्वां न कुक्ष्यन्तः समीक्षितः॥ ३०<br><br>ततः कदाचिदथ वै पुनर्वक्त्राद्विनिःसृतः।<br>गुप्तं न्यग्रोधशाखायां बालमेकं निरैक्षत॥ ३१<br><br>तथैवार्णवजले नीहारेणावृताम्बरे।<br>अव्यग्रः क्रीडते लोके सर्वभूतविवर्जिते॥ ३२<br><br>स मुनिर्विस्मयाविष्टः कौतूहलसमन्वितः।<br>बालमादित्यसंकाशं नाशक्नोदभिवीक्षितुम्॥ ३३<br><br>स चिन्तयंस्तथैकान्ते स्थित्वा सलिलसन्निधौ।<br>पूर्वदृष्टमिदं मन्ये शङ्कितो देवमायया॥ ३४<br><br>अगाधसलिले तस्मिन् मार्कण्डेयः सुविस्मयः।<br>प्लवंस्तथार्तिमगमद् भयात् संत्रस्तलोचनः॥ ३५<br><br>स तस्मै भगवानाह स्वागतं बालयोगवान्।<br>बभाषे मेघतुल्येन स्वरेण पुरुषोत्तमः॥ ३६<br><br>मा भैर्वत्स न भेतव्यमिहैवायाहि मेऽन्तिकम्।<br>मार्कण्डेयो मुनिस्त्वाह बालं तं श्रमपीडितः॥ ३७ | इस प्रकार बुद्धिमान् मार्कण्डेयके सौ वर्षोंसे भी अधिक कालतक समूची पृथ्वीपर भ्रमण करते रहनेपर भी उन्हें उस कुक्षिका अन्त न दीख पड़ा। तत्पश्चात् किसी समय वे पुनः उस पुरुषके मुखसे बाहर निकल आये। उस समय उन्होंने बरगदकी शाखामें छिपे हुए एक बालकको देखा, जो उसी प्रकारके एकार्णवके जलमें, यद्यपि आकाश नीहारसे आच्छादित था तथा जगत् समस्त प्राणियोंसे शून्य हो गया था, तथापि निश्चिन्तभावसे खेल रहा था। यह देखकर मार्कण्डेय मुनि आश्चर्यचकित हो गये। उनके मनमें उसे जाननेके लिये कुतूहल उत्पन्न हो गया, किंतु वे सूर्यके समान तेजस्वी उस बालककी ओर देखनेमें असमर्थ हो गये। तब जलके निकट एकान्त स्थानमें स्थित होकर विचार करते हुए मार्कण्डेयजी देवमायाके प्रभावसे सशङ्कित हो उसे पहले देखा हुआ मानने लगे। परम विस्मित हुए मार्कण्डेय उस अथाह जलमें तैरते हुए कष्टका अनुभव करने लगे तथा भयके कारण उनके नेत्र कातर हो गये। तब बालयोगी भगवान् पुरुषोत्तम मेघ-सदृश गम्भीर स्वरसे मार्कण्डेयसे स्वागतपूर्वक बोले—'वत्स! डरो मत, तुम्हें डरना नहीं चाहिये। यहाँ मेरे निकट आओ।' तदुपरान्त थके-माँदे मार्कण्डेय मुनि उस बालकसे बोले॥ ३०—३७॥ |
| मार्कण्डेय उवाच<br><br>को मां नाम्ना कीर्तयति तपः परिभवन्मम।<br>दिव्यं वर्षसहस्त्राख्यं धर्षयन्निव मे वयः॥ ३८<br><br>न ह्येष वः समाचारो देवेष्वपि ममोचितः।<br>मां ब्रह्मापि हि देवेशो दीर्घायुरिति भाषते॥ ३९<br><br>कस्तमो घोरमासाद्य मामद्य त्यक्तजीवितः।<br>मार्कण्डेयेति मामुक्त्वा मृत्युमीक्षितुमर्हति॥ ४० | मार्कण्डेयजीने कहा— यह कौन है, जो मेरी तपस्याका तिरस्कार करता हुआ मेरा नाम लेकर पुकार रहा है? यह एक हजार दिव्य वर्षोंवाली मेरी आयुका भी अपमान-सा कर रहा है। देवताओंमें भी किसीको मेरे प्रति ऐसा व्यवहार करना उचित नहीं है; क्योंकि देवेश्वर ब्रह्मा भी मुझे 'दीर्घायु' कहकर ही पुकारते हैं। जीवनसे हाथ धोनेवाला ऐसा कौन है, जो घोर अज्ञानान्धकारका आश्रय लेकर आज मुझे 'मार्कण्डेय' ऐसा कहकर मृत्युका मुख देखना चाहता है?॥ ३८—४०॥ |
| सूत उवाच<br><br>एवमाभाष्य तं क्रोधान्मार्कण्डेयो महामुनिः।<br>तथैव भगवान् भूयो बभाषे मधुसूदनः॥ ४१ | सूतजी कहते हैं— ऋषियो! महामुनि मार्कण्डेय क्रोधवश उस बालकसे ऐसा कहकर चुप हो गये। तब भगवान् मधुसूदन पुनः उसी प्रकार बोले॥ ४१॥ |