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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 697 of 1098

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Page 697
* अध्याय १६४ *६८७
तत्कर्म विश्ववेदानां तद्रहस्यं महर्षिणाम्।<br>तमिज्यं सर्वयज्ञानां तत्तत्त्वं सर्वदर्शिनाम्।<br>तदध्यात्मविदां चिन्त्यं नरकं च विकर्मिणाम्॥ २०<br>अधिदैवं च यद्दैवमधियज्ञं सुसंज्ञितम्।<br>तद्भूतमधिभूतं च तत्परं परमर्षिणाम्॥ २१<br>स यज्ञो वेदनिर्दिष्टस्तत्तपः कवयो विदुः।<br>यः कर्ता कारको बुद्धिमर्नः क्षेत्रज्ञ एव च॥ २२<br>प्रणवः पुरुषः शास्ता एकश्चेति विभाव्यते।<br>प्राणः पञ्चविधश्चैव ध्रुव अक्षर एव च॥ २३<br>कालः पाकश्च पक्ता च द्रष्टा स्वाध्याय एव च।<br>उच्यते विविधैर्देवः स एवायं न तत्परम्॥ २४<br>स एव भगवान् सर्वं करोति विकरोति च।<br>सोऽस्मान् कारयते सर्वान् सोऽत्येति व्याकुलीकृतान्॥ २५<br>यजामहे तमेवाद्यं तमेवेच्छाम निर्वृताः।<br>यो वक्ता यच्च वक्तव्यं यच्चाहं तद् ब्रवीमि वः॥ २६<br>श्रूयते यच्च वै श्राव्यं यच्चान्यत् परिजल्प्यते।<br>याः कथाश्चैव वर्तन्ते श्रुतयो वाथ तत्पराः।<br>विश्वं विश्वपतिर्यश्च स तु नारायणः स्मृतः॥ २७<br>यत्सत्यं यदमृतमक्षरं परं यत्-<br>यद्भूतं परममिदं च यद्भविष्यत्।<br>यत् किंचिच्चरमचरं यदस्ति चान्यत्<br>तत् सर्वं पुरुषवरः प्रभुः पुराणः॥ २८वही समस्त वेदोंका कर्म है। वही महर्षियोंका रहस्य है। सम्पूर्ण यज्ञोंद्वारा पूजनीय वही है। वही सर्वज्ञोंका तत्त्व है। अध्यात्मवेत्ताओंके लिये वही चिन्तनीय और कुकर्मियोंके लिये नरकस्वरूप है। उसीको अधिदेव, देव और अधियज्ञ नामसे अभिहित किया जाता है। वही भूत, अधिभूत और परमर्षियोंका परम तत्त्व है॥१५-२१॥<br><br>वेदोंद्वारा निर्दिष्ट यज्ञ वही है। विद्वान्लोग उसे तपरूपसे जानते हैं। जो कर्ता, कारक, बुद्धि, मन, क्षेत्रज्ञ, प्रणव, पुरुष, शास्ता और अद्वितीय कहा जाता है तथा विभिन्न देवता जिसे पाँच प्रकारका प्राण, अविनाशी ध्रुव, काल, पाक, पक्ता (पचानेवाला), द्रष्टा और स्वाध्याय कहते हैं, वह यही है। इसके अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं है। वे ही भगवान् सम्पूर्ण जगत्के उत्पादक हैं और वे ही संहारक भी हैं। वे ही हम सब लोगोंको उत्पन्न करते हैं और अन्तमें व्याकुल करके नष्ट कर देते हैं। हमलोग उन्हीं आदि पुरुषकी यज्ञद्वारा आराधना करते हैं और निवृत्तिपरायण होकर उन्हींको प्राप्त करनेकी इच्छा करते हैं। जो वक्ता है, जो वक्तव्य है, जिसके विषयमें मैं आपलोगोंसे कह रहा हूँ, जो सुना जाता है, जो सुनने योग्य है, जिसके विषयमें अन्य सारी बातें कही जाती हैं, जो कथाएँ प्रचलित हैं, श्रुतियाँ जिसके परायण हैं, जो विश्वस्वरूप और विश्वका स्वामी है, वही नारायण कहा गया है। जो सत्य है, जो अमृत है, जो अक्षर है, जो परात्पर है, जो भूत है और जो भविष्यत् है, जो चर-अचर जगत् है, इसके अतिरिक्त अन्य जो कुछ है, वह सब कुछ सामर्थ्यशाली एवं सर्वश्रेष्ठ पुराणपुरुष ही है॥२२-२८॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे पद्मोद्भवप्रादुर्भावे चतुःषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १६४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके पद्मोद्भवप्रादुर्भाव-प्रसङ्गमें एक सौ चौंसठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १६४॥