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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 695 of 1098

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Page 695
* अध्याय १६४ *६८५
परं परस्यापि परं रहस्यं<br>  परं परस्यापि परं महत्त्वम्।<br>परं परस्यापि परं महद्द्यत्<br>  त्वामाहुरग्र्यं पुरुषं पुराणम्॥ १०२<br>परं परस्यापि परं निधानं<br>  परं परस्यापि परं पवित्रम्।<br>परं परस्यापि परं च दान्तं<br>  त्वामाहुरग्र्यं पुरुषं पुराणम्॥ १०३<br>एवमुक्त्वा तु भगवान् सर्वलोकपितामहः।<br>स्तुत्वा नारायणं देवं ब्रह्मलोकं गतः प्रभुः॥ १०४<br>ततो नदत्सु तूर्येषु नृत्यन्तीष्वप्सरःसु च।<br>क्षीरोदस्योत्तरं कूलं जगाम हरिरीश्वरः॥ १०५<br>नारसिंहं वपुर्देवः स्थापयित्वा सुदीप्तिमत्।<br>पौराणं रूपमास्थाय प्रययौ गरुडध्वजः॥ १०६<br>अष्टचक्रेण यानेन भूतयुक्तेन भास्वता।<br>अव्यक्तप्रकृतिर्देवः स्वस्थानं गतवान् प्रभुः॥ १०७जो परात्पर रहस्य, परात्पर महत्त्व और परात्पर महत्तत्त्व है, वह सब आप अग्रजन्मा पुराणपुरुषको ही कहा जाता है। आप सर्वश्रेष्ठ पुराणपुरुषको परसे भी परम निधान, परसे भी परम पवित्र और परसे भी परम उदार कहा जाता है। ऐसा कहकर सम्पूर्ण लोकोंके पितामह सामर्थ्यशाली भगवान् ब्रह्मा नारायणदेवकी स्तुति कर ब्रह्मलोकको चले गये। उस समय तुरहियाँ बज रही थीं और अप्सराएँ नृत्य कर रही थीं। इसी बीच जगदीश्वर श्रीहरि क्षीरसागरके उत्तर तटपर जानेके लिये उद्यत हुए। वहाँसे जाते समय भगवान् गरुडध्वजने परम कान्तिमान् उस नरसिंह-शरीरको जगत्में स्थापित कर अपने पुराने रूपको धारण कर लिया था। फिर अव्यक्त प्रकृतिवाले भगवान् विष्णु पञ्चभूतोंसे युक्त एवं चमकीले आठ पहियेवाले रथपर सवार हो अपने निवास स्थानको चले गये॥ ९८—१०७॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे हिरण्यकशिपुवधो नाम त्रिषष्ठ्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १६३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें हिरण्यकशिपु-वध नामक एक सौ तिरसठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १६३॥


एक सौ चौंसठवाँ अध्याय

पद्मोद्भवके प्रसङ्गमें मनुद्वारा भगवान् विष्णुसे सृष्टिसम्बन्धी विविध प्रश्न और भगवान्का उत्तर

ऋषय ऊचुः<br>कथितं नरसिंहस्य माहात्म्यं विस्तरेण च।<br>पुनस्तस्यैव माहात्म्यमन्यद्विस्तरतो वद॥ १<br>पद्मरूपमभूदेतत् कथं हेममयं जगत्।<br>कथं च वैष्णवी सृष्टिः पद्ममध्येऽभवत् पुरा॥ २**ऋषियोंने पूछा—**सूतजी! आप भगवान् नरसिंहके माहात्म्यका तो विस्तारपूर्वक वर्णन कर चुके, अब पुनः उन्हीं भगवान्के दूसरे माहात्म्यको विस्तारपूर्वक बतलाइये। भला, पूर्वकालमें स्वर्णमय कमलसे यह जगत् कैसे उत्पन्न हुआ था और उस कमलमेंसे वैष्णवी सृष्टि कैसे प्रादुर्भूत हुई थी?॥ १-२॥
सूत उवाच<br>श्रुत्वा च नरसिंहस्य माहात्म्यं रविनन्दनः।<br>विस्मयोत्फुल्लनयनः पुनः पप्रच्छ केशवम्॥ ३**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! भगवान् नरसिंहके माहात्म्यको सुनकर सूर्यपुत्र मनुके नेत्र आश्चर्यसे उत्फुल्ल हो उठे, तब उन्होंने पुनः भगवान् केशवसे प्रश्न किया॥ ३॥
मनुरुवाच<br>कथं पाद्मे महाकल्पे तव पद्ममयं जगत्।<br>जलार्णवगतस्येह नाभौ जातं जनार्दन॥ ४**मनुने पूछा—**जनार्दन! 'पाद्मकल्प' में जब आप इस जलार्णवके मध्यमें स्थित थे, तब आपकी नाभिसे यह पद्ममय जगत् कैसे उत्पन्न हुआ था?