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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 693 of 1098

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Page 693
  • अध्याय १६३ * | ६८३
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| विचित्रनानाविहगं सुपुष्पितमहाद्रुमम्।<br>जातरूपमयैः शृङ्गैरप्सरोगणनादितम्॥ ७५<br>गिरिपुष्पितकश्चैव लक्ष्मीवान् प्रियदर्शनः।<br>उत्थितः सागरं भित्त्वा विश्रामश्चन्द्रसूर्ययोः।<br>रराज सुमहाशृङ्गैर्गगनं विलिखन्निव॥ ७६<br>चन्द्रसूर्यांशुसङ्काशैः सागराम्बुसमावृतैः।<br>विद्युत्वान् सर्वतः श्रीमानायतः शतयोजनम्॥ ७७<br>विद्युतां यत्र सङ्घाता निपात्यन्ते नगोत्तमे।<br>ऋषभः पर्वतश्चैव श्रीमान् वृषभसंज्ञितः॥ ७८<br>कुञ्जरः पर्वतः श्रीमान् यत्रागस्त्यगृहं शुभम्।<br>विशालाक्षश्च दुर्धर्षः सर्पाणामालयः पुरी॥ ७९<br>तथा भोगवती चापि दैत्येन्द्रेणाभिकम्पिता।<br>महासेनो गिरिश्चैव पारियात्रश्च पर्वतः॥ ८०<br>चक्रवांश्च गिरिश्रेष्ठो वाराहश्चैव पर्वतः।<br>प्राग्ज्योतिषपुरं चापि जातरूपमयं शुभम्॥ ८१<br>यस्मिन् वसति दुष्टात्मा नरको नाम दानवः।<br>मेघश्च पर्वतश्रेष्ठो मेघगम्भीरनिःस्वनः॥ ८२<br>षष्टिस्तत्र सहस्राणि पर्वतानां द्विजोत्तमाः।<br>तरुणादित्यसंकाशो मेरुस्तत्र महागिरिः॥ ८३<br>यक्षराक्षसगन्धर्वैर्नित्यं सेवितकन्दरः।<br>हेमगर्भो महाशैलस्तथा हेमसंखो गिरिः॥ ८४<br>कैलासश्चैव शैलेन्द्रो दानवेन्द्रेण कम्पिताः। | मनोहर, नाना प्रकारके रंग-विरंगे पक्षियोंसे युक्त और पुष्पोंसे लदे हुए महान् वृक्षोंसे सुशोभित था, उस अगस्त्य-भवनको भी कँपा दिया। इसके बाद जो लक्ष्मीवान्, प्रियदर्शन और अपने अत्यन्त ऊँचे शिखरोंसे आकाशमें रेखा-सी खींच रहा था तथा चन्द्रमा और सूर्यको विश्राम देनेके लिये सागरका भेदन कर बाहर निकला था, वह पुष्पितक गिरि अपने स्वर्णमय शिखरोंसे शोभा पा रहा था। फिर चन्द्रमा और सूर्यकी किरणोंके समान चमकीले एवं सागरके जलसे घिरे हुए शिखरोंसे युक्त शोभाशाली विद्युत्वान् पर्वत था, जो सब ओरसे सौ योजन विस्तृत था। उस पर्वतश्रेष्ठपर बिजलियोंके समूह गिराये जाते थे। वृषभ नामसे पुकारा जानेवाला शोभासम्पन्न ऋषभ पर्वत तथा शोभाशाली कुंजर पर्वत, जिसपर महर्षि अगस्त्यका सुन्दर आश्रम था। सर्पोंका दुर्धर्ष निवासस्थान विशालाक्ष तथा भोगवती पुरी—ये सभी दैत्येन्द्रद्वारा प्रकम्पित कर दिये गये। द्विजवरो! वहाँ महासेन गिरि, पारियात्र पर्वत, गिरिश्रेष्ठ चक्रवान्, वाराह पर्वत, स्वर्णनिर्मित रमणीय प्राग्ज्योतिषपुर, जिसमें नरक नामक दुष्टात्मा दानव निवास करता है, बादलोंके समान गम्भीर शब्द करनेवाला पर्वतश्रेष्ठ मेघ आदि साठ हजार पर्वत थे, वहीं मध्याह्नकालीन सूर्यके समान प्रकाशमान विशाल पर्वत मेरु था, जिसकी कन्दराओंमें यक्ष, राक्षस और गन्धर्व नित्य निवास करते थे। महान् पर्वत हेमगर्भ, हेमसंख गिरि तथा पर्वतराज कैलास—इन सबको भी दानवेन्द्र हिरण्यकशिपुने कँपा दिया॥ ७४-८४ ½ ॥ |
| हेमपुष्करसंछन्नं तेन वैखानसं सरः॥ ८५<br>कम्पितं मानसं चैव हंसकारण्डवाकुलम्।<br>त्रिशृङ्गपर्वतश्चैव कुमारी च सरिद्वरा॥ ८६<br>तुषारचयसंच्छन्नो मन्दरश्चापि पर्वतः।<br>उशीरबिन्दुश्च गिरिश्चन्द्रप्रस्थस्तथाद्रिराट्॥ ८७<br>प्रजापतिगिरिश्चैव तथा पुष्करपर्वतः।<br>देवाभ्रपर्वतश्चैव तथा वै रेणुको गिरिः॥ ८८<br>क्रौञ्चः सप्तर्षिशैलश्च धूप्रवर्णश्च पर्वतः।<br>एते चान्ये च गिरयो देशा जनपदास्तथा॥ ८९<br>नद्यः ससागराः सर्वाः सोऽकम्पयत दानवः।<br>कपिलश्च महीपुत्रो व्याघ्रवांश्चैव कम्पितः॥ ९० | हिरण्यकशिपुने स्वर्ण-सदृश कमल-पुष्पोंसे आच्छादित वैखानस सरोवर तथा हंसों और बतखोंसे भरे हुए मानसरोवरको भी कम्पित कर दिया। इसके बाद त्रिशृङ्ग पर्वत, नदियोंमें श्रेष्ठ कुमारी नदी, तुषारसमूहसे आच्छादित मन्दर पर्वत, उशीरविन्दु गिरि, पर्वतराज चन्द्रप्रस्थ, प्रजापति गिरि, पुष्कर पर्वत, देवाभ्र पर्वत, रेणुक गिरि, क्रौंच पर्वत, सप्तर्षिशैल तथा धूप्रवर्ण पर्वत—इनको तथा इनके अतिरिक्त अन्यान्य पर्वतों, देशों, जनपदों तथा सागरोंसहित सभी नदियोंको उस दानवने कम्पित कर दिया। साथ ही महीपुत्र कपिल और व्याघ्रवान् भी काँप उठे। |