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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 691 of 1098

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Page 691

* अध्याय १६३ * । ६८१


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
देवानामपि यो देवः सोऽप्यवर्षत शोणितम्।<br>अपतनगनादुल्का विद्युद्रूपा महास्वनाः॥ ४३<br>अकाले च द्रुमाः सर्वे पुष्पन्ति च फलन्ति च।<br>लताश्च सफलाः सर्वा ये चाहुर्दैत्यनाशनम्॥ ४४<br>फलैः फलान्यजायन्त पुष्पैः पुष्पं तथैव च।<br>उन्मीलन्ति निमीलन्ति हसन्ति च रुदन्ति च॥ ४५<br>विक्रोशन्ति च गम्भीरा धूमयन्ति ज्वलन्ति च।<br>प्रतिमाः सर्वदेवानां वेदयन्ति महत् भयम्॥ ४६<br>आरण्यैः सह संसृष्टा ग्राम्याश्च मृगपक्षिणः।<br>चक्रुः सुभैरवं तत्र महायुद्धमुपस्थितम्॥ ४७<br>नद्यश्च प्रतिकूलानि वहन्ति कलुषोदकाः।<br>न प्रकाशन्ति च दिशो रक्तरेणुसमाकुलाः॥ ४८<br>वानस्पत्यो न पूज्यन्ते पूजनार्हाः कथञ्चन।<br>वायुवेगेन हन्यन्ते भज्यन्ते प्रणमन्ति च॥ ४९विचरण कर रही थीं। जो देवताओंका भी देवता (इन्द्र) है, वह रक्तकी वर्षा करने लगा। आकाशसे बिजलीकी-सी कान्तिवाली उल्काएँ भयंकर शब्द करती हुई पृथ्वीपर गिरने लगीं। सभी वृक्ष असमयमें ही फूलने और फलने लगे तथा सभी लताएँ फलसे युक्त हो गयीं, जो दैत्योंके विनाशकी सूचना दे रही थीं। फलोंसे फल तथा फूलोंसे फूल प्रकट होने लगे। सभी देवताओंकी मूर्तियाँ कभी आँख फाड़कर देखतीं, कभी आँखें बंद कर लेतीं, कभी हँसती थीं तो कभी रोने लगती थीं। वे कभी जोर-जोरसे चिल्लाने लगती थीं, कभी गम्भीररूपसे धुआँ फेंकती थीं तो कभी प्रज्वलित हो जाती थीं। इस प्रकार वे महान् भयकी सूचना दे रही थीं। उस समय ग्रामीण मृग-पक्षी वन्य मृग-पक्षियोंसे संयुक्त होकर अत्यन्त भयंकर महान् युद्ध करने लगे। गंदे जलसे भरी हुई नदियाँ उलटी दिशामें बहने लगीं। रक्त और धूलसे व्याप्त दिशाएँ दिखायी नहीं दे रही थीं। पूजनीय वृक्षोंकी किसी प्रकार पूजा (रक्षा) नहीं हो रही थी। वे वायुके झोंकेसे प्रताडित हो रहे थे, झुक जाते थे और टूट भी जाते थे॥ ४१—४९॥
यदा च सर्वभूतानां छाया न परिवर्तते।<br>अपराह्नगते सूर्ये लोकानां युगसंक्षये॥ ५०<br>तदा हिरण्यकशिपोर्दैत्यस्योपरि वेश्मनः।<br>भाण्डागारायुधागारे निविष्टमभवन्मधु॥ ५१<br>असुराणां विनाशाय सुराणां विजयाय च।<br>दृश्यन्ते विविधोत्पाता घोरा घोरनिदर्शनाः॥ ५२इस प्रकार लोकोंके युगान्तके समय सूर्यके अपराह्नसमयमें पहुँचनेपर जब सभी प्राणियोंकी छायामें कोई परिवर्तन नहीं दीखने लगा, तब दैत्यराज हिरण्यकशिपुके महल, भाण्डारागार और आयुधागारके ऊपर मधु टपकने लगा। इस प्रकार असुरोंके विनाश और देवताओंकी विजयके लिये भयकी सूचना देनेवाले अनेकों प्रकारके भयंकर उत्पात दिखायी दे रहे थे।
एते चान्ये च बहवो घोरोत्पाताः समुत्थिताः।<br>दैत्येन्द्रस्य विनाशाय दृश्यन्ते कालनिर्मिताः॥ ५३ये तथा इनके अतिरिक्त और भी बहुत-से भयंकर उत्पात, जो कालद्वारा निर्मित थे, दैत्येन्द्र हिरण्यकशिपुके विनाशके लिये प्रकट हुए दीख रहे थे।
मेदिन्यां कम्पमानायां दैत्येन्द्रेण महात्मना।<br>महीधरा नागगणा निपेतुरमितौजसः॥ ५४<br>विषज्वालाकुलैर्वक्त्रैर्विमुञ्चन्तो हुताशनम्।<br>चतुःशीर्षाः पञ्चशीर्षाः सप्तशीर्षाश्च पन्नगाः॥ ५५<br>वासुकिस्तक्षकश्चैव कर्कोटकधनञ्जयौ।<br>एलामुखः कालियश्च महापद्मश्च वीर्यवान्॥ ५६<br>सहस्रशीर्षो नागो वै हेमतालध्वजः प्रभुः।<br>शेषोऽनन्तोमहाभागो दुष्प्रकम्प्यः प्रकम्पितः॥ ५७महान् आत्मबलसे सम्पन्न दैत्येन्द्र हिरण्यकशिपुद्वारा पृथ्वीके प्रकम्पित किये जानेपर पर्वत तथा अमित तेजस्वी नागगण गिरने लगे। वे चार, पाँच अथवा सात सिरवाले नाग विषकी ज्वालासे व्याप्त मुखोंद्वारा अग्नि उगलने लगे। वासुकि, तक्षक, कर्कोटक, धनञ्जय, एलामुख, कालिय, पराक्रमी महापद्म, एक हजार फणोंवाला सामर्थ्यशाली नाग हेमतालध्वज तथा महान् भाग्यशाली अनन्त शेषनाग—इन सबका काँपना यद्यपि अत्यन्त कठिन था, तथापि ये सभी काँप उठे।