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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 685 of 1098

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Page 685
* अध्याय १६२ *६७५

एक सौ बासठवाँ अध्याय

प्रह्लादद्वारा भगवान् नरसिंहका स्वरूप-वर्णन तथा नरसिंह और दानवोंका भीषण युद्ध

सूत उवाच
ततो दृष्ट्वा महात्मानं कालचक्रमिवागतम्।<br>नरसिंहवपुश्छन्नं भस्मच्छन्नमिवानलम्॥ १<br>हिरण्यकशिपोः पुत्रः प्रह्लादो नाम वीर्यवान्।<br>दिव्येन चक्षुषा सिंहमपश्यद् देवमागतम्॥ २<br>तं दृष्ट्वा रुक्मशैलाभमपूर्वां तनुमाश्रितम्।<br>विस्मिता दानवाः सर्वे हिरण्यकशिपुश्च सः॥ ३सूतजी कहते हैं—ऋषियो! तदनन्तर राखमें छिपी हुई अग्निकी तरह नरसिंह-शरीरमें छिपे हुए महात्मा विष्णुको कालचक्रकी भाँति आया देख हिरण्यकशिपुके पुत्र पराक्रमी प्रह्लादने दिव्य दृष्टिसे सिंहको देखकर समझ लिया कि भगवान् विष्णु आ गये। सुमेरु पर्वतकी-सी कान्तिवाले अपूर्व शरीरको धारण किये हुए उस सिंहको देखकर हिरण्यकशिपुसहित सभी दानव घबरा गये॥ १—३॥
प्रह्लाद उवाचतब प्रह्लादने कहा—
महाबाहो महाराज दैत्यानामादिसम्भवः।<br>न श्रुतं न च नो दृष्टं नारसिंहमिदं वपुः॥ ४<br>अव्यक्तप्रभवं दिव्यं किमिदं रूपमागतम्।<br>दैत्यान्तकरणं घोरं संशतीव मनो मम॥ ५<br>अस्य देवाः शरीरस्थाः सागराः सरितश्च याः।<br>हिमवान् पारियात्रश्च ये चान्ये कुलपर्वताः॥ ६<br>चन्द्रमाश्च सनक्षत्रैरादित्यैर्वसुभिः सह।<br>धनदो वरुणश्चैव यमः शक्रः शचीपतिः॥ ७<br>मरुतो देवगन्धर्वा ऋषयश्च तपोधनाः।<br>नागा यक्षाः पिशाचाश्च राक्षसा भीमविक्रमाः॥ ८<br>ब्रह्मा देवः पशुपतिर्ललाटस्था भ्रमन्ति वै।<br>स्थावराणि च सर्वाणि जङ्गमानि तथैव च॥ ९<br>भवांश्च सहितोऽस्माभिः सर्वैर्दैत्यगणैर्वृतः।<br>विमानशतसङ्कीर्णा तथैव भवतः सभा॥ १०<br>सर्वे त्रिभुवनं राजँल्लोकधर्माश्च शाश्वताः।<br>दृश्यन्ते नारसिंहेऽस्मिंस्तथैदमखिलं जगत्॥ ११<br>प्रजापतिश्चात्र मनुर्महात्मा<br>ग्रहाश्च योगाश्च महीरुहाश्च।<br>उत्पातकालश्च धृतिर्मतिश्च<br>रतिश्च सत्यं च तपो दमश्च॥ १२महाबाहु महाराज! आप दैत्योंके मूल पुरुष हैं। आपके इस नरसिंह-शरीरके विषयमें अबतक कभी कुछ न सुना ही गया और न इसे कभी देखा ही गया, अज्ञातरूपसे उत्पन्न होनेवाला यह कौन-सा दिव्यरूप आ पहुँचा है? मुझे लगता है कि आपका यह भयंकर रूप दैत्योंका अन्त ही करनेवाला है। इस सिंहके शरीरमें सभी देवता, समुद्र, सभी नदियाँ, हिमवान्, पारियात्र (विन्ध्य) आदि सभी कुलपर्वत, नक्षत्रों, आदित्यगणों और वसुगणोंसहित चन्द्रमा, कुबेर, वरुण, यमराज, शचीपति इन्द्र, मरुद्गण, देवगन्धर्व, तपोधन महर्षि, नाग, यक्ष, पिशाच, भयंकर पराक्रमी राक्षस, ब्रह्मा और भगवान् शंकर स्थित हैं। ये सभी ललाटमें स्थित होकर भ्रमण कर रहे हैं। राजन्! सभी स्थावर-जङ्गम प्राणी, हमलोगोंसहित तथा समस्त दैत्यगणोंसे घिरे हुए आप, सैकड़ों विमानोंसे भरी हुई आपकी यह सभा, सारी त्रिलोकी, शाश्वत लोकधर्म तथा यह अखिल जगत् इस नरसिंहके शरीरमें दिखायी पड़ रहे हैं। साथ ही इस शरीरमें प्रजापति, महात्मा मनु, ग्रह, योग, वृक्ष, उत्पात, काल, धृति,