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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 682 of 1098

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Page 682
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सर्वे च कामाः प्रचुरा ये दिव्या ये च मानुषाः।<br>रसयुक्तं प्रभूतं च भक्ष्यभोज्यमनन्तकम्॥ ४७<br><br>पुण्यगन्धस्रजश्चात्र नित्यपुष्पफलद्रुमाः।<br>उष्णे शीतानि तोयानि शीते चोष्णानि सन्ति च॥ ४८<br><br>पुष्पिताग्रा महाशाखाः प्रवालाङ्कुरधारिणः।<br>लतावितानसंछन्ना नदीषु च सरःसु च॥ ४९<br><br>वृक्षान् बहुविधांस्तत्र मृगेन्द्रो ददृशे प्रभुः।<br>गन्धवन्ति च पुष्पाणि रसवन्ति फलानि च॥ ५०<br><br>नातिशीतानि नोष्णानि तत्र तत्र सरांसि च।<br>अपश्यत् सर्वतीर्थानि सभायां तस्य स प्रभुः॥ ५१सभी प्रकारके मनोरथ, चाहे वे दिव्य हों या मानुष, सब-के-सब वहाँ प्रचुरमात्रामें उपलब्ध थे। वहाँ असंख्य प्रकारके अधिक-से-अधिक रसीले भक्ष्य एवं भोज्य पदार्थ और पुण्यगन्धमयी मालाएँ सुलभ थीं। वहाँके वृक्ष नित्य पुष्प और फल देनेवाले थे। वहाँका जल गर्मीमें शीतल और सर्दीमें उष्ण रहता था। वहाँ नदियों और सरोवरोंके तटपर बड़ी-बड़ी शाखाओंवाले वृक्ष लगे थे, जिनके अग्रभागमें पुष्प खिले हुए थे और जो लाल-लाल पल्लवों और अङ्कुरोंसे सुशोभित एवं लतारूपी वितानसे आच्छादित थे। भगवान् नृसिंह वहाँ ऐसे अनेकों प्रकारके वृक्ष देखे, जो सुगन्धित पुष्पों और रसदार फलोंसे लदे हुए थे। वहाँ यत्र-तत्र सरोवर भी थे, जिनमें न तो अत्यन्त शीतल और न गरम जल भरा रहता था॥ ४१-५० १/२ ॥
नलिजैः पुण्डरीकैश्च शतपत्रैः सुगन्धिभिः।<br>रक्तैः कुवलयैर्नीलैः कुमुदैः संवृतानि च॥ ५२<br>सुकान्तैर्धार्तराष्ट्रैश्च राजहंसैश्च सुप्रियैः।<br>कारण्‍डवैश्चक्रवाकैः सारसैः कुररैरपि॥ ५३<br>विमलैः स्फाटिकाभैश्च पाण्डुरच्छदनैर्द्विजैः।<br>बहुहंसोपगीतानि सारसाभिरुतानि च॥ ५४<br>गन्धवत्यः शुभास्तत्र पुष्पमञ्जरिधारिणीः।<br>दृष्टवान् पर्वताग्रेषु नानापुष्पधरा लताः॥ ५५भगवान् नृसिंहने उसकी सभामें सभी पुण्यक्षेत्रोंको भी देखा, जो सुगन्धयुक्त कमल, श्वेत कमल, लाल कमल, नील कमल और कुमुदिनी आदि पुष्पोंसे तथा अत्यन्त सुन्दर काली चोंच और काले पैरोंवाले हंसों, परमप्रिय लगनेवाले राजहंसों, बतखों, चक्रवाकों, सारसों, कराँकुलों एवं स्फटिककी-सी कान्तिवाले निर्मल और पीले पंखोंसे सुशोभित अन्यान्य पक्षियोंसे आच्छादित थे। उनमें बहुत-से हंस कूर्ज रहे थे और सर्वत्र सारसोंकी बोली सुनायी पड़ती थी। भगवान् नृसिंहने पर्वत-शिखरोंपर पुष्पोंसे लदी हुई अनेकों प्रकारकी लताओंको भी देखा, जो सुन्दर मंजरियोंसे सुशोभित थीं और जिनसे मनोरम गन्ध फैल रही थी। उस सभामें
केतक्यशोकसरलाः पुन्नागतिलकार्जुनाः।<br>चूता नीपाः प्रस्थपुष्पाः कदम्बा बकुला धवाः॥ ५६<br>प्रियङ्गुपाटलावृक्षाः शाल्मल्यः सहरिद्रकाः।<br>सालास्तालास्तमालाश्च चम्पकाश्र्च मनोरमाः॥ ५७<br>तथैवान्ये व्यराजन्त सभायां पुष्पिता द्रुमाः।<br>विद्रुमाश्च द्रुमाश्चैव ज्वलिताग्निसमप्रभाः॥ ५८<br>स्कन्धवन्तः सुशाखाश्च बहुतालसमुच्छ्रयाः।<br>अर्जुनाशोकवर्णाश्च बहवश्चित्रका द्रुमाः॥ ५९<br>वरुणो वत्सनाभश्च पनसाः सह चन्दनैः।<br>नीपाः सुमनसश्चैव निम्बा अश्वत्थतिन्दुकाः॥ ६०<br>पारिजाताश्च लोध्राश्च मल्लिका भद्रदारवः।<br>आमलक्यस्तथा जम्बूलकुचाः शैलवालुकाः॥ ६१केतकी, अशोक, सरल (चीड़), पुन्नाग, तिलक, अर्जुन, आम, नीप, प्रस्थपुष्प, कदम्ब, बकुल, धव, प्रियंगु, पाटल, शाल्मली, हरिद्रक, साल, ताल, तमाल, मनोरम चम्पक, विद्रुम तथा प्रज्वलित अग्निकी-सी कान्तिवाले अन्यान्य वृक्ष फूलोंसे लदे हुए शोभा पा रहे थे। वहाँ अर्जुन और अशोकके-से वर्णवाले मोटी-मोटी डालों एवं सुन्दर शाखाओंसे युक्त बहुत-से चित्रक (रेंड़ या तिलक)-के वृक्ष थे, जिनकी ऊँचाई अनेकों तालवृक्षोंके बराबर थी। वहाँ वरुण, वत्सनाभ, कटहल, चन्दन, सुन्दर पुष्पोंसे युक्त नीप, नीम, पीपल, तिन्दुक, पारिजात, लोध्र, मल्लिका, भद्रदारु, आमला, जामुन, बड़हर, शैलबालुक,