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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 672 of 1098

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Page 672

६६२ * मत्स्यपुराण *

एक सौ उनसठवाँ अध्याय

स्कन्दकी उत्पत्ति, उनका नामकरण, उनसे देवताओंकी प्रार्थना और उनके द्वारा देवताओंको आश्वासन, तारकके पास देवदूतद्वारा संदेश भेजा जाना और सिद्धोंद्वारा कुमारकी स्तुति

सूत उवाचसूतजी कहते हैं—ऋषियो! पुनः पार्वती देवीकी
वामं विदार्य निष्क्रान्तः सुतो देव्याः पुनः शिशुः।<br>स्कन्दाच्च वदने वह्नेः शुकात् सुवदनोऽरिहा॥ १<br>कृत्तिकामेलनादेव शाखाभिः सविशेषतः।<br>शाखाभिधाः समाख्याताः षट्सु वक्त्रेषु विस्तृताः॥ २<br>यतस्ततो विशाखोऽसौ ख्यातो लोकेषु षण्मुखः।<br>स्कन्दो विशाखः षड्वक्त्रः कार्तिकेयश्च विश्रुतः॥ ३<br>चैत्रस्य बहुले पक्षे पञ्चदश्यां महाबलौ।<br>सम्भूतावर्कसदृशौ विशाले शरकानने॥ ४<br>चैत्रस्यैव सिते पक्षे पञ्चम्यां पाकशासनः।<br>बालकाभ्यां चकारैकं मत्वा चामरभूतये॥ ५<br>तस्यामेव ततः षष्ठ्यामभिषिक्तो गुहः प्रभुः।<br>सर्वैरमरसंघातैर्ब्रह्मेन्द्रोपेन्द्रभास्करैः॥ ६<br>गन्धमाल्यैः शुभैर्धूपैस्तथा क्रीडनकैरपि।<br>छत्रैश्चामरजालैश्च भूषणैश्च विलेपनैः॥ ७<br>अभिषिक्तो विधानेन यथावत् षण्मुखः प्रभुः।<br>सुतामस्मै ददौ शक्रो देवसेनेति विश्रुताम्॥ ८<br>पत्यर्थं देवदेवस्य ददौ विष्णुस्तदायुधान्।<br>यक्षाणां दशलक्षाणि ददावस्मै धनाधिपः॥ ९<br>ददौ हुताशनस्तेजो ददौ वायुश्च वाहनम्।<br>ददौ क्रीडनकं त्वष्टा कुक्कुटं कामरूपिणम्।<br>एवं सुरास्तु ते सर्वे परिवारमनुत्तमम्॥ १०<br>ददुर्मुदितचेतस्काः स्कन्दायादित्यवर्चसे॥ ११<br>जानुभ्यामवनीं स्थित्वा सुरसंघास्तमस्तुवन्।<br>स्तोत्रेणानेन वरदं षण्मुखं मुख्यशः सुराः॥ १२बायीं कोखको फाड़कर दूसरा शिशु पुत्ररूपमें बाहर निकला। सर्वप्रथम अग्निके मुखमें वीर्यका क्षरण होनेके कारण वह बालक सुन्दर मुखवाला और शत्रुओंका विनाशक हुआ। उसके छः मुख हुए। चूँकि छहों मुखोंमें विस्तृत शाखा नामसे प्रसिद्ध कृतिकाओंकी शाखाओंका विशेषरूपसे मेल हुआ था, इसलिये वह बालक लोकोंमें 'विशाख' नामसे विख्यात हुआ। इस प्रकार वह स्कन्द, विशाख, षड्वक्त्र और कार्तिकेयके नामसे प्रख्यात हुआ। चैत्रमासके कृष्णपक्षकी पंद्रहवीं तिथि (अमावास्या)-को विशाल सरपतके वनमें सूर्यके समान तेजस्वी एवं महाबली ये दोनों शिशु उत्पन्न हुए थे। पुनः चैत्रमासके शुक्लपक्षकी पञ्चमी तिथिको पाकशासन इन्द्रने देवताओंके लिये कल्याणकारी मानकर दोनों बालकोंको सम्मिलित करके एकीभूत कर दिया। उसी मासकी षष्ठी तिथिको ब्रह्मा, इन्द्र, विष्णु, सूर्य आदि सभी देवसमूहोंद्वारा सामर्थ्यशाली गुह (देव-सेनापतिके पदपर) अभिषिक्त किये गये। उस समय चन्दन, पुष्पमाला, माङ्गलिक धूप, खिलौना, छत्र, चँवरसमूह, आभूषण और अङ्गरागद्वारा भगवान् षण्मुखका विधिपूर्वक यथावत् अभिषेक किया गया था। इन्द्रने 'देवसेना' नामसे विख्यात कन्याको उन्हें पत्नीरूपमें प्रदान किया। भगवान् विष्णुने देवाधिदेव गुहको अनेकों आयुध समर्पित किया। कुबेर उन्हें दस लाख यक्ष प्रदान किये। अग्निने तेज दिया। वायुने वाहन समर्पित किया। त्वष्टाने खिलौना तथा स्वेच्छानुसार रूप धारण करनेवाला एक मुर्गा प्रदान किया। इस प्रकार उन सभी देवताओंने प्रसन्न मनसे सूर्यके समान तेजस्वी स्कन्दको सर्वश्रेष्ठ परिवार प्रदान किया। तत्पश्चात् प्रधान-प्रधान देवताओंके समूह पृथ्वीपर घुटने टेककर उन वरदायक षण्मुखकी निम्नाङ्कित स्तोत्रद्वारा स्तुति करने लगे॥ १—१२॥