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Read in context| ६५८ | * मत्स्यपुराण * |
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एक सौ अट्ठावनवाँ अध्याय
वीरकद्वारा पार्वतीकी स्तुति, पार्वती और शंकरका पुनः समागम, अग्निको शाप, कृत्तिकाओंकी प्रतिज्ञा और स्कन्दकी उत्पत्ति
| वीरक उवाच | **वीरकने कहा—**कमललोचने! मेरी स्नेहवत्सला माता पार्वती ने भी मुझे ऐसा ही आदेश दिया है, अतः कोई भी परायी स्त्री भवनके भीतर प्रवेश नहीं कर सकती। वीरकद्वारा ऐसा कही जानेपर पार्वतीदेवी मनमें विचार करने लगीं कि वायुने मुझे जिस स्त्रीके विषयमें सूचना दी थी, वह स्त्री नहीं थी, प्रत्युत वह कोई दैत्य था। क्रोधके वशीभूत हो मैंने व्यर्थ ही वीरकको शाप दे दिया। क्रोधसे प्रेरित हुए मूर्खलोग प्रायः इसी प्रकार अकार्य कर बैठते हैं। क्रोध करनेसे कीर्ति नष्ट हो जाती है और क्रोध सुस्थिर लक्ष्मीका भी विनाश कर देता है। इसी कारण तत्त्वार्थको निश्चितरूपसे न जानकर मैंने अपने पुत्रको ही शाप दे दिया। जिनकी बुद्धि विपरीत अर्थको ग्रहण करती है, उन्हें विपत्तियाँ मिलती हैं। ऐसा विचारकर पार्वती कमल-सी कान्तिवाले मुखसे लज्जाका नाट्य करती हुई वीरकसे इस प्रकार कहने लगीं॥ १–५॥ |
| एवमुक्त्वा गिरिसुता माता मे स्नेहवत्सला।<br>प्रवेशं लभते नान्या नारी कमललोचने॥ १<br><br>इत्युक्ता तु तदा देवी चिन्तयामास चेतसा।<br>न सा नारीति दैत्योऽसौ वायुर्मे यामभाषत॥ २<br><br>वृथैव वीरकः शप्तो मया क्रोधपरीतया।<br>अकार्यं क्रियते मूढैः प्रायः क्रोधसमीरितैः॥ ३<br><br>क्रोधेन नश्यते कीर्तिः क्रोधो हन्ति स्थिरां श्रियम्।<br>अपरिच्छिन्नतत्त्वार्था पुत्रं शापितवत्यहम्।<br>विपरीतार्थबुद्धीनां सुलभो विपदोदयः॥ ४<br><br>संचिन्त्यैवमुवाचेदं वीरकं प्रति शैलजा।<br>लज्जासज्जविकारेण वदनेनाम्बुजत्विषा॥ ५ | |
| देव्युवाच | **देवी बोलीं—**वीरक! तुम अपने मनमें मेरे प्रति संदेह मत करो। मैं ही हिमाचलकी पुत्री, शंकरजीकी प्रियतमा पत्नी और तुम्हारी माता हूँ। बेटा! मेरे शरीरकी अभिनव शोभाके भ्रमसे तुम शङ्का मत करो। यह गौर कान्ति मुझे ब्रह्माने प्रसन्न होकर प्रदान की है। मुझे यह दैत्यद्वारा निर्मित वृत्तान्त ज्ञात नहीं था, अतः शंकरजीके एकान्तमें स्थित रहनेपर किसी अन्य नारीका प्रवेश (तुम्हारी असावधानीसे) जानकर मैंने तुम्हें शाप दे दिया है। वह शाप तो अब टाला नहीं जा सकता, किंतु उससे उद्धारका उपाय तुम्हें बतला रही हूँ। तुम मनुष्य-योनिमें जन्म लेकर वहाँ अपना मनोरथ पूरा करके शीघ्र ही मेरे पास वापस आ जाओगे॥ ६–९॥ |
| अहं वीरक ते माता मा तेऽस्तु मनसो भ्रमः।<br>शङ्करस्यास्मि दयिता सुता तुहिनभूभृतः॥ ६<br><br>मम गात्रच्छविभ्रान्त्या मा शङ्कां पुत्र भावय।<br>तुष्टेन गौरता दत्ता ममेयं पद्मजन्मना॥ ७<br><br>मया शप्तोऽस्यविदिते वृत्तान्ते दैत्यनिर्मिते।<br>ज्ञात्वा नारीप्रवेशं तु शङ्करे रहसि स्थिते॥ ८<br><br>न निवर्तयितुं शक्यः शापः किंतु ब्रवीमि ते।<br>शीघ्रमेष्यसि मानुष्यात्स त्वं कामसमन्वितः॥ ९ | |
| सूत उवाच | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! तदनन्तर वीरक प्रसन्न मनसे उदय हुए पूर्णिमाके चन्द्रमाकी-सी कान्तिवाली माता पार्वतीको सिर झुकाकर प्रणाम करनेके पश्चात् बोला॥ १०॥ |
| शिरसा तु ततो वन्द्य मातरं पूर्णमानसः।<br>उवाचोदितपूर्णेन्दुद्युतिं च हिमशैलजाम्॥ १० | |