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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 655 of 1098

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Page 655
* अध्याय १५४ *६४५
वीणावाद्यमुखोद्घुष्टा नानास्थानकनर्तकाः ।<br>गणेशांस्तांस्तथा दृष्ट्वा देवी प्रोवाच शङ्करम् ॥ ५३६<br><br>देव्युवाच<br>गणेशाः कति संख्याताः किं नामानः किमात्मकाः ।<br>एकैकशो मम ब्रूहि धिष्ठिता ये पृथक् पृथक् ॥ ५३७कुछ मुखसे वीणा आदि बाजे बजा रहे थे और कुछ यत्र-तत्र नाच रहे थे। इस प्रकार उन गणेश्वरोंको देखकर पार्वतीदेवी शंकरजीसे बोलीं ॥ ५३०-५३६ ॥<br><br>देवीने पूछा— 'प्रभो ! इन गणेश्वरोंकी संख्या कितनी है ? इनके क्या-क्या नाम हैं ? इनके स्वभाव कैसे हैं ? ये जो पृथक्-पृथक् बैठे हैं, इनमेंसे मुझे एक-एकका परिचय दीजिये ॥ ५३७ ॥
शङ्कर उवाच<br>कोटिसंख्या ह्यसंख्याता नानाविख्यातपौरुषाः ।<br>जगदापूरितं सर्वैरेभिर्भीमैर्महाबलैः ॥ ५३८<br>सिद्धक्षेत्रेषु रथ्यासु जीर्णोद्यानेषु वेश्मसु ।<br>दानवानां शरीरेषु बालेषून्मत्तकेषु च ।<br>एते विशन्ति मुदिता नानाहारविहारिणः ॥ ५३९<br>ऊष्मपाः फेनपाश्चैव धूमपा मधुपायिनः ।<br>रक्तपाः सर्वभक्षाश्च वायुपा ह्यम्बुभोजनाः ॥ ५४०<br>गेयनृत्योपहाराश्च नानावाद्यरवप्रियाः ।<br>न ह्येषां वै अनन्तत्वाद् गुणान् वक्तुं हि शक्यते ॥ ५४१शंकरजी बोले— 'देवि! यों तो ये असंख्य हैं, परंतु प्रधान-प्रधान गणेश्वरोंकी संख्या एक करोड़ है। ये विभिन्न प्रकारके पुरुषार्थोंके लिये विख्यात हैं। इन सभी महाबली भयंकर गणोंसे सारा जगत् परिपूर्ण है। नाना प्रकारके आहार-विहारसे युक्त ये गणेश्वर हर्षपूर्वक सिद्ध क्षेत्रों, गलियों, पुराने उद्यानों, घरों, दानवोंके शरीरों, बालकों और पागलोंमें प्रवेश करते हैं। ये सभी ऊष्मा, फेन, धूम, मधु, रक्त और वायुका पान करनेवाले हैं। जल इनका भोजन है और ये सर्वभक्षी हैं। ये नाच-गानके उपहारसे प्रसन्न होनेवाले और अनेकों प्रकारके वाद्य-शब्दोंके प्रेमी हैं। अनन्त होनेके कारण इनके गुणोंका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ ५३८-५४१ ॥
देव्युवाच<br>मार्गत्वगुत्तरासङ्गः शुद्धाङ्गो मुञ्जमेखली ।<br>वामस्थेन च शिक्येन चपलो रञ्जिताननः ॥ ५४२<br>मृगदंष्ट्रो ह्युत्पलानां स्रग्दामो मधुराकृतिः ।<br>पाषाणशकलोत्तानकांस्यतालप्रवर्तकः ॥ ५४३<br>असौ गणेश्वरो देवः किं नामा किंनरानुगः ।<br>य एष गणगीतेषु दत्तकर्णो मुहुर्मुहुः ॥ ५४४देवीने पूछा— 'स्वामिन् ! जो मृगचर्मका दुपट्टा लपेटे हुए हैं, जिसके सभी अङ्ग शुद्ध हैं; जो मूँजकी मेखला धारण किये हुए हैं, जिसके बायें कंधेपर झोली लटक रही है, जो अत्यन्त चञ्चल और रँगे हुए मुखवाला है, जिसकी दाढ़ सिंहके सदृश है, जो कमल-पुष्पोंकी माला धारण किये हुए, सुन्दर आकृतिसे युक्त और पाषाण-खण्डसे उत्तान रखे हुए काँसेके बाजेपर ताल लगा रहा है तथा जिसके पीछे किन्नर लोग चल रहे हैं और जो अन्य गणोंद्वारा गाये गये गीतोंपर बार-बार कान लगाये हुए हैं, उस गणेश्वर देवका क्या नाम है ? ॥ ५४२-५४४ ॥
शर्व उवाच<br>स एष वीरको देवि सदा मद्धृदयप्रियः ।<br>नानाश्चर्यगुणाधारो गणेश्वरगणार्चितः ॥ ५४५शंकरजीने कहा— देवि! यही वह वीरक है, जो सदा मेरे हृदयको प्रिय लगनेवाला है। यह नाना प्रकारके आश्चर्यजनक गुणोंका आश्रय तथा सभी गणेश्वरोंद्वारा पूजित—सम्मानित है ॥ ५४५ ॥
देव्युवाच<br>ईदृशस्य सुतस्यास्ति ममोत्कण्ठा पुरान्तक ।<br>कदाहमीदृशं पुत्रं द्रक्ष्याम्यानन्ददायिनम् ॥ ५४६देवीने पूछा— त्रिपुरनाशक भगवन्! मेरे मनमें ऐसा ही पुत्र प्राप्त करनेकी प्रबल उत्कण्ठा है। मैं कब ऐसे आनन्ददायक पुत्रको देखूँगी ? ॥ ५४६ ॥