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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 653 of 1098

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Page 653
  • अध्याय १५४ * ६४३
अधुना दर्शिते मार्गे मर्यादां कर्तुमर्हसि।<br>फलं किं भविता देवि कल्पितैस्तरुपुत्रकैः।<br>इत्युक्ता हर्षपूर्णाङ्गी प्रोवाचोमा शुभां गिरम्॥ ५१०<br><br>देव्युवाच<br><br>एवं निरुदके देशे यः कूपं कारयेद् बुधः।<br>बिन्दौ बिन्दौ च तोयस्य वसेत् संवत्सरं दिवि॥ ५११<br><br>दशकूपसमा वापी दशवापीसमो ह्रदः।<br>दशह्रदसमः पुत्रो दशपुत्रसमो द्रुमः।<br>एषैव मम मर्यादा नियता लोकभाविनी॥ ५१२<br><br>इत्युक्तास्तु ततो विप्रा बृहस्पतिपुरोगमाः।<br>जग्मुः स्वमन्दिराण्येव भवानीं वन्द्य सादरम्॥ ५१३<br><br>गतेषु तेषु देवोऽपि शङ्करः पर्वतात्मजाम्।<br>पाणिनाऽऽलम्ब्य वामेन शनैः प्रावेशयच्छुभाम्॥ ५१४<br><br>चित्तप्रसादजननं प्रासादमनुगोपुरम्।<br>लम्बमौक्तिकदामानं मालिकाकुलवेदिकम्॥ ५१५<br><br>निर्धौतकलधौतं च क्रीडागृहमनोरमम्।<br>प्रकीर्णकुसुमामोदमत्तालिकुलकूजितम् ॥ ५१६<br><br>किन्नरोद्गीतसङ्गीतगृहान्तरितभित्तिकम् ।<br>सुगन्धिधूपसङ्घातमनःप्रार्थ्यमलक्षितम् ॥५१७<br><br>क्रीडन्मयूरनारीभिर्वृतं वै ततवादिभिः।<br>हंससंघातसङ्घृष्टं स्फाटिकस्तम्भवेदिकम्॥ ५१८<br><br>अनारतमतिप्रीत्या बहुशः किन्नराकुलम्।<br>शुकैर्यत्राभिहन्यन्ते पद्मरागविनिर्मिताः॥५१९<br><br>भित्तयो दाडिमभ्रान्त्या प्रतिबिम्बितमौक्तिकाः।<br>तत्राक्षक्रीडया देवी विहर्तुमुपचक्रमे॥ ५२०<br><br>स्वच्छेन्द्रनीलभूभागे क्रीडने यत्र धिष्ठितौ।<br>वपुःसहायतां प्राप्तौ विनोदरसनिर्वृतौ॥ ५२१<br><br>एवं प्रक्रीडतोस्तत्र देवीशङ्करयोस्तदा।<br>प्रादुर्भवन्महाशब्दस्तद्गृहोदरगोचरः ॥५२२देवि! इस समय आप शास्त्रद्वारा प्रदर्शित मार्गकी मर्यादा निर्धारित करें। इन कल्पित तरुपुत्रकोंसे क्या लाभ उपलब्ध होगा?' ऐसा कही जानेपर उमाके अङ्ग हर्षसे पूर्ण हो गये, तब वे सुन्दर वाणीमें बोलीं ॥ ४९९—५१० ॥<br><br>पार्वतीदेवीने कहा—'विप्रवरो! इस प्रकारके जलरहित प्रदेशमें जो बुद्धिमान् पुरुष कुआँ बनवाता है, वह कुएँके जलके एक-एक बूँदके बराबर वर्षोंतक स्वर्गमें निवास करता है। इस प्रकार दस कुएँके समान एक बावली, दस बावलीके सदृश एक सरोवर, दस सरोवरकी तुलनामें एक पुत्र और दस पुत्रके समान एक वृक्ष माना गया है। यही लोकोंका कल्याण करनेवाली मर्यादा है, जिसे मैं निर्धारित कर रही हूँ। इस प्रकार कहे जानेपर बृहस्पति आदि विप्रगण भवानीको आदरपूर्वक नमस्कार कर अपने-अपने निवास-स्थानको चले गये। उन सबके चले जानेपर देवाधिदेव शङ्करने भी सुन्दरी पार्वतीको बायें हाथका सहारा देकर धीरे-धीरे अपने भवनमें प्रवेश कराया। चित्तको प्रसन्न करनेवाला वह भवन फाटकके निकट ही था। उसमें मोतियोंकी लम्बी-लम्बी झालरें लटक रही थीं, वेदिकाएँ पुष्पहारोंसे सुसज्जित थीं, तपाये हुए स्वर्णके मनोरम क्रीडागृह बने हुए थे, बिखरे हुए पुष्पोंकी सुगन्धसे उन्मत्त हुए भँवरे गुंजार कर रहे थे, किन्नरोंद्वारा गाये गये संगीतसे गृहकी भीतरी दीवाल प्रतिध्वनित हो रही थी, मनको अच्छी लगनेवाली सुगन्धित धूपोंकी भीनी सुगन्ध फैल रही थी। वह नाचती हुई मयूरियों तथा तारवाले बाजे बजानेवाले वादकोंसे व्याप्त था। वहाँ हंस-समूहोंकी ध्वनि गूँज रही थी, स्फटिकके खम्भोंसे युक्त वेदिकाएँ सुशोभित थीं, अधिकांश किन्नर अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक निरन्तर उपस्थित रहते थे। उसमें पद्मराग मणिकी दीवालें बनी हुई थीं, जिनपर मोतियोंकी झलक पड़ रही थी, इस कारण अनारके भ्रमसे शुकसमूह उनपर अपने ठोरोंसे आघात कर रहे थे। ऐसे भवनमें पार्वतीदेवी द्यूतक्रीडाके माध्यमसे विहार करने लगीं। निर्मल इन्द्रनील मणिके बने हुए उस क्रीडा-स्थानपर क्रीडा करते हुए शिव-पार्वती विनोदके रसमें निमग्न हो परस्पर एक-दूसरेके शरीरकी सहायताको प्राप्त हुए॥ ५११—५२१॥<br><br>इस प्रकार वहाँ पार्वती और शंकरके क्रीडा करते समय उस गृहके भीतर महान् भयंकर शब्द प्रादुर्भूत हुआ।