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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 651 of 1098

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Page 651
* अध्याय १५४ *६४१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
शर्वेण पाणिग्रहणमग्निसाक्षिकमक्षतम्।<br>दाता महीभृतां नाथो होता देवश्चतुर्मुखः॥ ४८४<br><br>वरः पशुपतिः साक्षात् कन्या विश्वारणिस्तथा।<br>चराचराणि भूतानि सुरासुरवराणि च॥ ४८५<br><br>तत्राप्येते नियमतो ह्यभवन् व्यग्रमूर्तयः।<br>मुमोचाभिनवान् सर्वान् सस्यशालीन रसौषधीः॥ ४८६<br><br>व्यग्रा तु पृथिवी देवी सर्वभावमनोरमा।<br>गृहीत्वा वरुणः सर्वरत्नान्याभरणानि च॥ ४८७<br><br>पुण्यानि च पवित्राणि नानारत्नमयानि तु।<br>तस्थौ साभरणो देवो हर्षदः सर्वदेहिनाम्॥ ४८८उन्होंने विधानानुसार मन्त्रोच्चारणपूर्वक सारा कार्य सम्पन्न किया। तदुपरान्त शिवजीने अग्निको साक्षी बनाकर गिरिजाका अटूट पाणिग्रहण किया। उस विवाहोत्सवमें पर्वतोंके राजा हिमाचल दाता, देवाधिदेव ब्रह्मा होता, साक्षात् शिव वर तथा विश्वकी अरणिभूता पार्वती कन्या थीं। उस समय प्रधान देवता एवं असुर तथा चराचर सभी प्राणी (कार्याधिक्यके कारण) नियमको छोड़कर व्यग्र हो उठे। सभी प्रकारके मनोरम भावोंसे परिपूर्ण पृथ्वीदेवी आकुल होकर सभी प्रकारके नूतन अन्नों, रसों और औषधियोंको उड़ेलने लगीं। सभी प्राणियोंको हर्ष प्रदान करनेवाले वरुणदेव स्वयं आभूषणोंसे विभूषित हो सभी प्रकारके रत्नों तथा अनेकविध रत्नोंसे निर्मित पुण्यमय एवं पावन आभरणोंको लेकर वहाँ उपस्थित थे॥ ४७९-४८८॥
धनदश्चापि दिव्यानि हैमान्याभरणानि च।<br>जातरूपविचित्राणि प्रयतः समुपस्थितः॥ ४८९<br><br>वायुर्ववौ सुसुरभिः सुखसंस्पर्शनो विभुः।<br>छत्रमिन्दुकराेद्गारं सुसितं च शतक्रतुः॥ ४९०<br><br>जग्राह मुदितः स्रग्वी बाहुभिर्बहुभूषणैः।<br>जगगुर्गन्धर्वमुख्याश्च ननृतुश्चाप्सरोगणाः॥ ४९१<br><br>वादयन्तोऽति मधुरं जगुर्गन्धर्वकिन्नराः।<br>मूर्ताश्च ऋतवस्तत्र जगुश्च ननृतुश्च वै॥ ४९२<br><br>चपलाश्च गणास्तस्थुर्लोलयन्तो हिमाचलम्।<br>उत्तिष्ठन् क्रमशःश्चात्र विश्वभृग्भगनेत्रहा॥ ४९३<br><br>चकारौद्वाहिकं कृत्यं पत्न्या सह यथोचितम्।<br>दत्तार्घो गिरिराजेन सुरवृन्दैर्विनोदितः॥ ४९४<br><br>अवसत् तां क्षपां तत्र पत्न्या सह पुरान्तकः।<br>ततो गन्धर्वगीतेन नृत्येनाप्सरसामपि॥ ४९५<br><br>स्तुतिभिर्देवदैत्यानां विबुद्धो विबुधाधिपः।<br>आमन्त्र्य हिमशैलेन्द्रं प्रभाते चोमया सह।<br>जगाम मन्दरगिरिं वायुवेगेन शृङ्गिणा॥ ४९६उस समय वहाँ कुबेर भी विनयभावसे विभिन्न प्रकारके स्वर्णमय दिव्य आभूषणोंको लिये हुए उपस्थित थे। स्पर्शसे सुख उत्पन्न करनेवाली परम सुगन्धित वायु चारों ओर बहने लगी। मालाधारी इन्द्र हर्षपूर्वक अनेकों आभूषणोंसे विभूषित अपनी भुजाओंद्वारा चन्द्रमाकी किरणोंके समान कान्तिमान् अत्यन्त उज्ज्वल छत्र लिये हुए थे। प्रधान-प्रधान गन्धर्व गीत गा रहे थे और अप्सराएँ नाच रही थीं। कुछ अन्य गन्धर्व और किंनर बाजा बजाते हुए अत्यन्त मधुर स्वरसे राग अलाप रहे थे। वहाँ छहों ऋतुएँ भी शरीर धारणकर नाचती और गाती थीं। चञ्चल प्रकृतिवाले प्रमथगण हिमाचलको विचलित करते हुए उपस्थित थे। इसी समय विश्वके पालनकर्ता एवं भगदेवताके नेत्रोंके विनाशक भगवान् शिव उठे और अपनी पत्नी पार्वतीके साथ क्रमशः सारा वैवाहिक कार्य यथोचितरूपसे सम्पन्न किये। उस समय पर्वतराज हिमाचलने उन्हें अर्घ्य प्रदान किया और सुरसमूह विनोदकी बातें करने लगे। तत्पश्चात् त्रिपुरके विनाशक भगवान् शङ्करने उस रातमें पत्नीके साथ वहाँ निवास किया। प्रातःकाल गन्धर्वोंके गीत, अप्सराओंके नृत्य तथा देवों एवं दैत्योंकी स्तुतियोंके माध्यमसे जगाये गये देवेश्वर शङ्कर पर्वतराज हिमाचलसे आज्ञा लेकर उमाके साथ वायुके समान वेगशाली नन्दीश्वरपर सवार हो मन्दराचलको चले गये॥ ४८९-४९६॥