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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 647 of 1098

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Page 647

* अध्याय १५४ * ६३७

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ततस्तु ते गणाधीशा विनयात् तत्र वीरकम् ॥ ४४५<br><br>प्रोचुर्व्यग्राकृते त्वं नो समावेदय शूलिने।<br>निष्यन्नाभरणं देवं प्रसाध्येशं प्रसाधनैः ॥ ४४६<br><br>सप्त वारिधयस्तस्थुः कर्तुं दर्पणविभ्रमम्।<br>ततो विलोकितात्मानं महाम्बुधिजलोदरे ॥ ४४७<br><br>धरामालिङ्ग्य जानुभ्यां स्थाणुं प्रोवाच केशवः।<br>शोभसे देव रूपेण जगदानन्ददायिना ॥ ४४८<br><br>मातरः प्रेरयन् कामवधूं वैधव्यचिह्निताम्।<br>कालोऽयमिति चालक्ष्य प्रकारेङ्गितसंज्ञया ॥ ४४९<br><br>ततस्ताश्चोदिता देवमूचुः प्रहसिताननाः।<br>रतिः पुरस्तव प्राप्ता नाभाति मदनोज्झिता ॥ ४५०<br><br>ततस्तां सन्निवार्याह वामहस्ताग्रसंज्ञया।<br>प्रयाणे गिरिजावक्त्रदर्शनोत्सुकमानसः ॥ ४५१तत्पश्चात् वहाँ आये हुए गणाधीशोंने विनयपूर्वक वीरकसे कहा—'भयंकर आकृतिवाले वीरक! तुम शंकरजीसे हमारे आगमनकी सूचना दे दो। हमलोग सजे-सजाये महादेवको शृङ्गार-सामग्रियोंद्वारा पुनः सुशोभित करेंगे।' इतनेमें वहाँ सातों समुद्र दर्पणकी स्थानपूर्ति करनेके लिये उपस्थित हुए। तब उस महासागरके जलके भीतर अपने रूपको देखकर भगवान् केशव घुटनोंद्वारा पृथ्वीका आलिङ्गन करके (अर्थात् पृथ्वीपर दोनों घुटने टेककर) शंकरजीसे बोले—'देव! इस समय आप अपने इस जगत्को आनन्द प्रदान करनेवाले रूपसे सुशोभित हो रहे हैं।' इसी बीच मातृकाओंने उपयुक्त समय जानकर वैधव्यके चिह्नोंसे युक्त काम-पत्नी रतिको इशारेसे शंकरजीके सम्मुख जानेके लिये प्रेरित किया। (तब वह शिवजीके समक्ष जाकर खड़ी हो गयी।) तब वे मातृकाएँ हँसती हुई शंकरजीसे बोलीं—'देव! आपके सम्मुख खड़ी हुई कामदेवसे रहित यह रति शोभा नहीं पा रही है।' तब शंकरजी अपने बायें हाथके अग्रभागके संकेतसे उसे सान्त्वना देते हुए सामनेसे हटाकर प्रस्थित हुए। उस समय उनका मन गिरिजाके मुखका अवलोकन करनेके लिये समुत्सुक हो रहा था ॥ ४४५–४५१ ॥
ततो हरो हिमगिरिकन्दराकृतिं<br>  समुन्नतं मृदुगतिभिः प्रचोदयन्।<br>महावृषं गणतुमुलाहितेक्षणं<br>  स भूधरानशनिरिव प्रकम्पयन् ॥ ४५२<br><br>ततो हरिर्द्रुतपदपद्धतिः पुरः-<br>  सरः श्रमाद् द्रुमनिकरेषु विश्रमन्।<br>धरारजः शबलितभूषणोऽब्रवीत्<br>  प्रयात मा कुरुत पथोऽस्य संकटम् ॥ ४५३<br><br>प्रभोः पुनः प्रथमनियोगमूर्जयन्<br>  सुतोऽब्रवीद् भ्रुकुटिमुखोऽपि वीरकः।<br>वियच्चरा वियति किमस्ति कान्तकं<br>  प्रयात नो धरणिधरा विदूरतः ॥ ४५४<br><br>महार्णवाः कुरुत शिलोपमं पयः<br>  सुरद्विषागमनमहातिकर्दमम् ।<br>गणेश्वराश्चपलतया न गम्यतां<br>  सुरेश्वरैः स्थिरगतिभिश्च गम्यताम् ॥ ४५५तदुपरान्त शंकरजीने विशालकाय महावृषभ नन्दीश्वरपर, जिसकी आकृति हिमाचलके गुफा-सदृश थी तथा जिसके नेत्र प्रमथगणोंकी ओर लगे हुए थे, सवार होकर उसे धीमी चालसे आगे बढ़ाया। उस समय उनके प्रस्थानसे पृथ्वी उसी प्रकार काँप रही थी, मानो वज्रके प्रहारसे पर्वत काँप रहे हों। तत्पश्चात् श्रीहरिने जिनके आभूषण पृथ्वीकी धूलसे धूसरित हो गये थे, शीघ्रतापूर्वक कदम बढ़ाते हुए आगे जाकर श्रमवश घने वृक्षोंके नीचे विश्राम करते हुए लोगोंसे कहा—'अरे! चलो, आगे बढ़ो, इस मार्गमें भीड़ मत करो।' पुनः शंकरजीका पुत्र वीरक भौंहें टेढ़ी कर श्रीहरिकी प्रथम आज्ञाको उच्च स्वरसे फैलाता हुआ बोला—'अरे आकाशचारियो! आकाशमें कौन-सी सुन्दर वस्तु रखी है, जिसे सब लोग देख रहे हो, आगे बढ़ो। पर्वतसमूहो! तुमलोग एक-दूसरेसे अलग-अलग होकर चलो। महासागरो! तुमलोग राक्षसोंके आगमनसे उत्पन्न हुए महान् कीचड़से युक्त जलको शिलासदृश कर दो। गणेश्वरो! तुमलोग चञ्चलतापूर्वक मत चलो। सुरेश्वरोंको स्थिरगतिसे चलना चाहिये।