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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 640 of 1098

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Page 640

६३० * मत्स्यपुराण *

| अथ नारायणो देवः स्वकां छायां समाश्रयत् ॥ ३५९<br><br>तत्प्रेरितः प्रकुरुते जन्म नानाप्रकारकम्।<br>सापि कर्मण एवोक्ता प्रेरणा विवशात्मनाम् ॥ ३६०<br><br>यथोन्मादादिजुष्टस्य मतिरेव हि सा भवेत्।<br>इष्टान्येव यथार्थानि विपरीतानि मन्यते ॥ ३६१<br><br>लोकस्य व्यवहारेषु सृष्टेषु सहते सदा।<br>धर्माधर्मफलावाप्तौ विष्णुरेव निबोधितः ॥ ३६२<br><br>अथानादित्वमस्यास्ति सामान्यात्तु तदात्मना।<br>न हास्य जीवितं दीर्घं दृष्टं देहे तु कुत्रचित् ॥ ३६३<br><br>भवद्भिर्र्यस्य नो दृष्टमन्तमग्रमथापि वा।<br>देहिनां धर्म एवैष क्वचिज्जायेत क्वचिन्मियेत् ॥ ३६४<br><br>क्वचिद्गर्भगतो नश्येत्क्वचिज्जीवेज्जरामयः।<br>क्वचित्समाः शतं जीवेत् क्वचिद्बाल्ये विपद्यते ॥ ३६५<br><br>शतायुः पुरुषो यस्तु सोऽनन्तः स्वल्पजन्मनः।<br>जीवितो न म्रियत्यग्रे तस्मात् सोऽमर उच्यते ॥ ३६६<br><br>अदृष्टजन्मनिधना ह्येवं विष्ण्वादयो मताः।<br>एतत् संशुद्धमैश्वर्यं संसारे को लभेदिह ॥ ३६७<br><br>तत्र क्षयादियोगात् तु नानाश्रर्यस्वरूपिणि।<br>तस्माद्विश्वसृरान् सर्वान् मलिनान् स्वल्पभूतिकान् ॥ ३६८<br><br>नाहं भद्राः किलेच्छामि ऋते शर्वात् पिनाकिनः।<br>स्थितं च तारतम्येन प्राणिनां परमं त्विदम् ॥ ३६९<br><br>धीबलैश्वर्यकार्यादिप्रमाणं महतां महत्।<br>यस्मान्न कश्चिदपरं सर्वे यस्मात् प्रवर्तते ॥ ३७०<br><br>यस्यैश्वर्यमनाद्यन्तं तमहं शरणं गता।<br>एष मे व्यवसायश्च दीर्घोऽतिविपरीतकः ॥ ३७१<br><br>यात वा तिष्ठतैवाथ मुनयो मद्विधायकाः।<br>एवं निशम्य वचनं देव्या मुनिवरास्तदा ॥ ३७२<br><br>आनन्दाश्रुपरीताक्षाः सस्वजुस्तां तपस्विनीम्।<br>ऊचुश्च परमप्रीताः शैलजां मधुरं वचः ॥ ३७३ | तदनन्तर भगवान् नारायण अपनी छायाका आश्रय ग्रहण करते हैं और उससे प्रेरित हो नाना प्रकारका जन्म धारण करते हैं। वह प्रेरणा भी भाग्याधीन प्राणियोंके कर्मके अनुरूप ही कही गयी है, जो उन्माद आदिसे युक्त पुरुषकी बुद्धि-जैसी होती है; क्योंकि वह अपनी यथार्थ इष्ट वस्तुओंको भी विपरीत ही मानता है और सदा लोकके लिये रचे गये व्यवहारोंमें कष्ट भोगता है। इस प्रकार धर्म और अधर्मके फलकी प्राप्तिमें विष्णु ही कारण माने गये हैं। यद्यपि विष्णुको सामान्यतया आत्मरूपसे अनादि माना जाता है, तथापि उनका किसी भी देहमें दीर्घ जीवन नहीं देखा गया। आपलोग भी उनके आदि-अन्तको नहीं जानते, किंतु देहधारियोंका यह धर्म है कि वे कहीं जन्म लेते हैं तो मरते कहीं हैं। कहीं गर्भमें ही नष्ट हो जाते हैं तो कहीं बुढ़ापा और रोगसे ग्रस्त होकर भी जीवित रहते हैं। कोई सौ वर्षोंतक जीवित रहता है तो कोई बचपनमें ही कालके गालमें चला जाता है। जिस पुरुषकी आयु सौ वर्षकी होती है, वह थोड़ी आयुवालेकी अपेक्षा अनन्त आयुवाला कहा जाता है। सदा जीवित रहते हुए जो आगे चलकर मृत्युको नहीं प्राप्त होता, उसे अमर कहा जाता है। इस तरह विष्णु आदि देवगण भी प्रारब्ध, जन्म और मृत्युसे युक्त माने गये हैं। भला, जो विनाश आदिके संयोगसे नाना प्रकारके आश्चर्यमय स्वरूपोंसे युक्त है, उस संसारमें ऐसा विशुद्ध ऐश्वर्य किसको प्राप्त हो सकता है? अतः भद्रपुरुषो! मैं पिनाकधारी शङ्करजीके अतिरिक्त इन सभी मलिन एवं स्वल्प विभूतिवाले देवताओंको नहीं वरण करना चाहती। प्राणियोंकी यह उत्कृष्टता तो क्रमशः चली ही आ रही है, किंतु जो महापुरुष हैं, उनके बल, बुद्धि, ऐश्वर्य और कार्यका प्रमाण भी विशाल होता है। अतः जिन शङ्करजीसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है और जहाँ पहुँचकर सभी समाप्त हो जाते हैं तथा जिनका ऐश्वर्य आदि-अन्तसे रहित है, मैंने उन्हींकी शरण ग्रहण की है। मेरा यह व्यवसाय अत्यन्त महान् तथा विचित्र है। मेरे कल्याणका विधान करनेवाले मुनियो! अब आपलोग चाहे चले जायें अथवा ठहरें, यह आपकी इच्छापर निर्भर है। पार्वती देवीके ऐसे वचन सुनकर उन मुनिवरोंकी आँखोंमें आनन्दके आँसू छलक आये। तब उन्होंने उस तपस्विनी कन्याको गले लगाया। फिर वे परम प्रसन्न होकर पार्वतीसे मधुर वाणीमें बोले॥ ३५९-३७३॥ |