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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 64 of 1098

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Page 64
५४* मत्स्यपुराण *

तेरहवाँ अध्याय

पितृ-वंश-वर्णन तथा सतीके वृत्तान्त-प्रसङ्गमें देवीके एक सौ आठ नामोंका विवरण

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मनुरुवाच<br>भगवञ्छ्रोतुमिच्छामि पितॄणां वंशमुत्तमम्।<br>रवेश्च श्राद्धदेवत्वं सोमस्य च विशेषतः॥ १**मनुने पूछा—**भगवन्! अब मैं पितरोंके उत्तम वंशका वर्णन सुनना चाहता हूँ। उसमें भी विशेषरूपसे यह जाननेकी अभिलाषा है कि सूर्य और चन्द्रमा श्राद्धके देवता कैसे हो गये?॥ १॥
मत्स्य उवाच<br>हन्त ते कथयिष्यामि पितॄणां वंशमुत्तमम्।<br>स्वर्गे पितृगणा सप्त त्रयस्तेषाममूर्त्तयः॥ २<br>मूर्तिमन्तोऽथ चत्वारः सर्वेषाममितौजसः।<br>अमूर्तयः पितृगणा वैराजस्य प्रजापतेः॥ ३<br>यजन्ति यान् देवगणा वैराजा इति विश्रुताः।<br>ये चैते योगविभ्रष्टाः प्राप्य लोकान् सनातनान्॥ ४<br>पुनर्ब्रह्मादिनान्ते तु जायन्ते ब्रह्मवादिनः।<br>सम्प्राप्य तां स्मृतिं भूयो योगं सांख्यमनुत्तमम्॥ ५<br>सिद्धिं प्रयान्ति योगेन पुनरावृत्तिदुर्लभाम्।<br>योगिनामेव देयानि तस्माच्छ्राद्धानि दातृभिः॥ ६<br>एतेषां मानसी कन्या पत्नी हिमवतो मता।<br>मैनाकस्तस्य दायादः क्रौञ्चस्तस्याग्रजोऽभवत्।<br>क्रौञ्चद्वीपः स्मृतो येन चतुर्थो घृतसंवृतः॥ ७<br>मेना च सुषुवे तिस्रः कन्या योगवतीस्ततः।<br>उमैकपर्णा पर्णा च तीव्रव्रतपरायणाः॥ ८<br>रुद्रस्यैका सितस्यैका जैगीषव्यस्य चापरा।<br>दत्ता हिमवता बालाः सर्वा लोके तपोऽधिकाः॥ ९**मत्स्यभगवान् कहने लगे—**राजर्षे! बड़े आनन्दकी बात है, अब मैं तुमसे पितरोंके श्रेष्ठ वंशका वर्णन कर रहा हूँ; सुनो। स्वर्गमें पितरोंके सात गण हैं। उनमें तीन मूर्तिरहित और चार मूर्तिमान् हैं। वे सब-के-सब अमित तेजस्वी हैं। अमूर्त पितृगण वैराजनामक प्रजापतिकी संतान हैं, इसीलिये वैराज नामसे प्रसिद्ध हैं। देवगण उनकी पूजा करते हैं। ये सभी सनातन लोकोंको प्राप्त करनेके पश्चात् योगमार्गसे च्युत हो जाते हैं तथा ब्रह्माके दिनके अन्तमें पुनः ब्रह्मवादीरूपमें उत्पन्न होते हैं। उस समय ये पूर्वजन्मकी स्मृति हो जानेसे पुनः सर्वोत्तम सांख्ययोगका आश्रय लेकर योगाभ्यासद्वारा आवागमनके चक्रसे मुक्त करनेवाली सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं। इस कारण दाताओंद्वारा योगियोंको ही श्राद्धीय वस्तुएँ प्रदान करनी चाहिये। इन उपर्युक्त पितरोंकी मानसी कन्या मेना हिमवान्की पत्नी मानी गयी है। मैनाक उसका पुत्र है। क्रौञ्च उससे भी पहले पैदा हुआ था। इसी क्रौञ्चके नामपर घृतसे परिवेष्टित चतुर्थ द्वीप क्रौञ्चद्वीप नामसे विख्यात है। तत्पश्चात् मेनाने उमा, एकपर्णा और अपर्णा नामकी तीन कन्याओंको जन्म दिया, जो सब-की-सब योगाभ्यासमें निरत, कठोर व्रतमें तत्पर तथा लोकमें सर्वश्रेष्ठ तपस्विनी थीं। हिमवान्ने इनमेंसे एक कन्या रुद्रको, एक सितको तथा एक जैगीषव्यको प्रदान कर दी॥ २—९॥
ऋषय ऊचुः<br>कस्माद् दाक्षायणी पूर्वं ददाहात्मानमात्मना।<br>हिमवद्दुहिता तद्वत् कथं जाता महीतले॥ १०<br>संहरन्ती किमुक्तासौ सुता वा ब्रह्मसूनुना।<br>दक्षेण लोकजननी सूत विस्तरतो वद॥ ११**ऋषियोंने पूछा—**सूतजी! पूर्वकालमें दक्ष-पुत्री सतीने अपने शरीरको अपने-आप ही क्यों जला डाला? तथा पुनः उसी प्रकारका शरीर धारणकर वे भूतलपर हिमवान्की कन्याके रूपमें कैसे प्रकट हुईं? उस समय ब्रह्माके पुत्र दक्षने लोकजननी सतीको, जो उन्हींकी पुत्री थीं, कौन-सी ऐसी बात कह दी थी, जिससे वे स्वयं ही जल मरीं? ये सभी बातें हमें विस्तारपूर्वक बतलाइये॥१०-११॥
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