मत्स्य महापुराण

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| * अध्याय १५४ * | ६२१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| व्यजृम्भत जगद्दग्धुं ज्वालाहुङ्कारघस्मरः।<br>ततो भवो जगद्धेतोर्व्यभजज्जातवेदसम्॥ २५१<br><br>सहकारे मधौ चन्द्रे सुमनःसु परेष्वपि।<br>भृङ्गेषु कोकिलास्येषु विभागेन स्मरानलम्॥ २५२<br><br>स बाह्यान्तरविद्धेन हरेण स्मरमार्गणः।<br>रागस्नेहसमिद्धान्तर्ध्वंस्तीव्रहुताशनः ॥ २५३<br><br>विभक्तलोकसंक्षोभकरो दुर्वारजृम्भितः।<br>सम्प्राप्य स्नेहसम्पृक्तं कामिनां हृदयं किल॥ २५४<br><br>ज्वलत्यहर्निशं भीमो दुश्चिकित्स्यमुखात्मकः। | जगत्को जलानेके लिये आगे बढ़ी और लपटोंके हुंकारसे पदार्थोंको भक्षण करने लगी। तब शङ्करजीने जगत्का कल्याण करनेके लिये उस अग्निका विभाजन कर दिया। उन्होंने कामाग्निको विभक्त कर आमके वृक्ष, वसन्त-ऋतु (अथवा चैत्रमास), चन्द्रमा, सुगन्धित पुष्पों, भ्रमरों और कोकिलोंके मुखोंमें स्थापित कर दिया। बाहर और भीतर—दोनों प्रकारसे घायल हुए शिवजीद्वारा विभक्त हुआ वह कामदेवका बाण अनुराग और स्नेहसे उद्दीप्त हो वेगपूर्वक दौड़ती हुई अग्निकी तरह लोगोंके मनोंको क्षुब्ध करने लगा। उसकी उन्नति रोकी नहीं जा सकती थी। वह इतना भयंकर थी कि उसके प्रतिषेधका कोई उपाय बड़ी कठिनाईसे हो सकता था। इस प्रकार वह अब भी कामियोंके स्नेहसिक्त हृदयमें पहुँचकर उन्हें रात-दिन जलाता रहता है॥ २४७—२५४ १/२ ॥ |
| विलोक्य हरहुङ्कारज्वालाभस्मकृतं स्मरम्॥ २५५<br><br>विललाप रतिः क्रूरं बन्धुना मधुना सह।<br>ततो विलप्य बहुशो मधुना परिसान्त्विता॥ २५६<br><br>जगाम शरणं देवमिन्दुमौलिं त्रिलोचनम्।<br>भृङ्गानुयातां संगृह्य पुष्पितां सहकारजाम्॥ २५७<br><br>लतां पवित्रकस्थाने पाणौ परभृतां सखीम्।<br>निर्बध्य तु जटाजूटं कुटिलैरलकै रतिः॥ २५८<br><br>उद्धूल्य गात्रं शुभ्रेण हृद्येन स्मरभस्मना।<br>जानुभ्यामवनीं गत्वा प्रोवाचेन्दुविभूषणम्॥ २५९ | इस प्रकार कामदेवको शङ्करजीके हुंकारकी ज्वालासे भस्म हुआ देख रति कामदेवके मित्र वसन्तके साथ फूट-फूटकर विलाप करने लगी। बहुत प्रकारसे विलाप करनेके पश्चात् वसन्तद्वारा समझायी-बुझायी जानेपर रति त्रिनेत्रधारी भगवान् चन्द्रशेखरकी शरणमें जानेके लिये प्रस्थित हुई। उस समय उसने अपने एक हाथमें पवित्रकके स्थानपर फूली हुई आमकी लताको, जिसपर भौंरे मँडरा रहे थे, धारण कर रखा था और उसके दूसरे हाथपर उसकी सखी कोयल बैठी थी। उसने अपने घुँघराले बालोंको जटाजूटके रूपमें बाँधकर अपने प्रियतम कामदेवके श्वेत भस्मसे शरीरको धूसरित कर लिया था। वहाँ पहुँचकर वह पृथ्वीपर घुटने टेककर भगवान् चन्द्रशेखरसे बोली—॥ २५५—२५९॥ |
| रतिरुवाच<br>नमः शिवायस्तु निरामयाय<br>नमः शिवायस्तु मनोमयाय।<br>नमः शिवायस्तु सुरार्चिताय<br>तुभ्यं सदा भक्तकृपापराय॥ २६०<br>नमो भवायास्तु भवोद्भवाय<br>नमोऽस्तु ते ध्वस्तमनोभवाय।<br>नमोऽस्तु ते गूढमहाव्रताय<br>नमोऽस्तु मायागहनाश्रयाय॥ २६१ | रतिने कहा—जो सब प्रकारकी क्षतिसे रहित हैं, उन शिवको नमस्कार है। जो सभी प्राणियोंके मनःस्वरूप हैं, उन शिवको प्रणाम है। जो देवताओंद्वारा पूजित और सदा भक्तोंपर कृपा करनेवाले हैं, उन आप शिवको अभिवादन है। जगत्को उत्पन्न करनेवाले शिवको नमस्कार है। कामदेवको भस्म कर देनेवाले आपको प्रणाम है। गुप्त रूपसे महान् व्रतको धारण करनेवाले आपको अभिवादन है। मायारूपी काननका आश्रय लेनेवालेको नमस्कार है। |