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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 599 of 1098

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Page 599
* अध्याय १५३ *५८९

| सम्प्राप्तो निमिमातङ्गो यावच्छक्रगजं प्रति।<br>तावच्छक्रगजो यातो मुक्त्वा नादं स भैरवम्॥ ५८<br>ध्रियमाणोऽपि यत्नेन स रणे नैव तिष्ठति।<br>पलायिते गजे तस्मिन्नारूढः पाकशासनः॥ ५९<br>विपरीतमुखोऽयुध्यद् दानवेन्द्रबलं प्रति। | निमिका गजराज ज्यों ही इन्द्रके गजराजके पास पहुँचा त्यों ही इन्द्रका गज ऐरावत भयंकर चिग्घाड़ करता हुआ भाग खड़ा हुआ। प्रयत्नपूर्वक रोके जानेपर भी वह रणभूमिमें नहीं खड़ा हुआ। तब उस भागते हुए गजराजपर आरूढ़ हुए इन्द्र पीछे मुख करके दानवेन्द्रोंकी सेनाके साथ युद्ध करने लगे॥ ५१—५९ १/२॥ |
| शतक्रतुस्तु वज्रेण निमिं वक्षस्यताडयत्॥ ६०<br>गदया दन्तिनश्चास्य गण्डदेशेऽहनद् दृढम्।<br>तत्प्रहारमचिन्त्यैव निमिर्निर्भयपौरुषः॥ ६१<br>ऐरावतं कटीदेशे मुद्गरेणाभ्यताडयत्।<br>स हतो मुद्गरेणाथ शक्रकुञ्जर आहवे॥ ६२<br>जगाम पश्चाच्चरणैर्धरणीं भूधराकृतिः।<br>लाघवात् क्षिप्रमुत्थाय ततोऽमरमहागजः॥ ६३<br>रणादपससर्पाशु भीषितो निमिहस्तिना।<br>ततो वायुर्ववौ रुक्षो बहुशर्करपांसुलः॥ ६४<br>सम्मुखो निमिमातङ्गो जवनाचलकम्पनः।<br>स्रुतरक्तो बभौ शैलो घनधातुह्रदो यथा॥ ६५<br>धनेशोऽपि गदां गुर्वी तस्य दानवहस्तिनः।<br>चिक्षेप वेगाद् दैत्येन्द्रो निपपातास्य मूर्धनि॥ ६६<br>गजो गदानिपातेन स तेन परिमूर्च्छितः।<br>दन्तैर्भित्त्वा धरां वेगात् पपाताचलसंनिभः॥ ६७<br>पतिते तु गजे तस्मिन् सिंहनादो महानभूत्।<br>सर्वतः सुरसैन्यानां गजबृंहितबृंहितैः॥ ६८<br>हेषारवेण चाश्वानां गुणास्फोटैश्च धन्विनाम्।<br>गजं तं निहतं दृष्ट्वा निमिं चापि पराङ्मुखम्॥ ६९<br>श्रुत्वा च सिंहनादं च सुराणामतिकोपनः।<br>जम्भो जज्वल कोपेन पीताज्य इव पावकः॥ ७० | उस समय इन्द्रने वज्रसे निमिके वक्षःस्थलपर आघात किया और गदासे उसके हाथीके गण्डस्थलपर गहरी चोट पहुँचायी। फिर तो निर्भय पुरुषार्थी निमिने उस प्रहारकी कुछ भी परवाह न कर ऐरावतके कटिप्रदेशपर मुद्गरसे चोट की। युद्धमें मुद्गरसे आहत हुआ पर्वत-सरीखा विशालकाय इन्द्रका हाथी ऐरावत अपने पिछले पैरोंसे पृथ्वीपर बैठ गया। फिर निमिके हाथीसे डरा हुआ इन्द्रका वह महागज बड़ी फुर्तीसे शीघ्र ही उठकर वेगपूर्वक रणभूमिसे दूर हट गया। उस समय प्रचुर मात्रामें बालू और धूलसे भरी हुई रूखी वायु बहने लगी। ऐसी दशामें भी अपने वेगसे पर्वतको भी कम्पित कर देनेवाला निमिका गजराज सम्मुख खड़ा था। उसके शरीरसे रक्त बह रहा था, जिसके कारण वह गेरु आदि धातुओंके गहरे कुण्डसे युक्त पर्वतकी भाँति शोभा पा रहा था। तब धनेशने भी दानवके उस हाथीपर वेगपूर्वक अपनी भारी गदा चलायी, जो उसके मस्तकपर जा गिरी, जिससे दैत्येन्द्र तो भूतलपर गिर पड़ा और वह हाथी उस गदाके आघातसे मूर्च्छित हो गया। वह वेगपूर्वक दाँतोंसे पृथ्वीको विदीर्ण करके पर्वत-सरीखे धराशायी हो गया। उस गजराजके गिर जानेपर देवताओंकी सेनाओंमें सब ओर महान् सिंहनाद होने लगा। उस समय हर्षसे भरे हुए गजसमूह चिग्घाड़ने लगे, घोड़े हींसने लगे और धनुर्धारियोंके धनुषोंकी प्रत्यञ्चाएँ चटचटाने लगीं। इस प्रकार उस हाथीको मारा गया और निमिको भी युद्धविमुख देखकर तथा देवताओंका सिंहनाद सुनकर प्रचण्ड क्रोधी जम्भ घीकी आहुति पड़े हुए अग्निकी तरह क्रोधसे जल उठा॥ ६०—७०॥ |
| स सुरान् कोपरक्ताक्षो धनुष्यारोप्य सायकम्।<br>तिष्ठतेत्यब्रवीत्तावत् सारथिं चाप्यचोदयत्॥ ७१<br><br>वेगेन चलतस्तस्य तद्रथस्याभवद् द्युतिः।<br>यथाऽऽदित्यसहस्रस्याभ्युदितस्योदयाचले ॥ ७२ | उस समय क्रोधसे लाल नेत्रोंवाले जम्भासुरने अपने धनुषपर बाण चढ़ाकर देवताओंको ललकारते हुए कहा—'खड़े रहो! (भागकर कहाँ जाओगे)।' साथ ही अपने सारथिको आगे बढ़नेके लिये प्रेरित किया। तब वेगपूर्वक चलते हुए उसके रथकी ऐसी शोभा हो रही थी मानो उदयाचलपर उदित हुए हजारों सूर्य हों। |